एसईसीएल कोल माफिया गिरोहों के कब्जे में

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लिंकेज के नाम से हो रहे करोड़ों का घोटाला, क्या कोयला मंत्री घोटाले को उजागर कर पायेगें?

भागवत जायसवाल, बिलासपुर (म.प्र.)

‘छत्तीसगढ़ रिपोर्टर’ ने 1 से 7 फरवरी 1999 के अंक में ‘एस.ई.सी.एल. कोल माफिया गिरोहों के कब्जे में’ लिंकेज के नाम से हो रहे करोड़ों का घोटाला के शीर्षक से खुलासा किया था। जिसमें कोयला का धंधा करने वाले व्यापारियों के लिए एस.ई.सी.एल. बिलासपुर की विभिन्न ईकाईयां सोने का खान सिद्ध हो रही हैं। कोयला माफिया इस व्यापार को छोटे रूप में शुरू कर आज करोड़पति बन गये हैं। लघु उद्योग (लिंकेज) के नाम से विभिन्न ईकाईयों से कोयला दिये जाते हैं जिसमें करोड़ों रुपए का घोटाला लंबे अर्से से कोयला व्यापारी कर रहे थे। एक ही परमिट में कई-कई बार कोयला दिया गया जा रहा था और बिना ड्राफ्ट के भी करोड़ों का कोयला दिये जाने का संदेह था। इस अवैध कारोबार में अहम भूमिका एस.ई.सी.एल. के सी.एम.डी. एवं सी.जी.एम. (विक्रय) की हाेती है। जिन व्यापारियों पर इनकी कृपा होती है वह, जिस प्रकार ‘पारस पत्थर’ के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है उसी प्रकार सैकड़ों कोयला व्यापारी पारस पत्थर रूपी इन अधिकारियों की कृपा से रातों रात करोड़पति बन जाते हैं। इनके द्वारा किये गये अवैध कारोबार के बारे में लिखा जाये तो एक ‘पोथी’ भी कम होगा। विशेष उल्लेखनीय है कि वर्ष 1991-92 से 97-98 तक कुल 2500.30 लाख टन कोयला रेल मार्ग एवं सडक़ मार्ग से परिवहन किया गया था। अगर प्रति टन के हिसाब से 5 रूपये भी कमीशन के बतौर अधिकारियों द्वारा लिया गया होगा तो यह रकम (2500.30×5) तो लगभग 12 अरब 50 करोड़ 1 लाख रुपए होता है। इस अवैध कारोबार में निम्नाधिकारी से लेकर उच्चाधिकारी और कुछ राजनेता के भी शामिल होने से इंकार नही किया जा सकता। अगर इसकी उच्चस्तरीय या सी.बी.आई. जांच कराई जाये तो यह अरबों रुपयों का घोटाला उजागर हो सकता है। ‘छत्तीसगढ़ रिपोर्टर’ ने 1 से 7 फरवरी 1999 के अंक में ‘एस.ई.सी.एल. कोल माफिया गिरोहों के कब्जे में’ लिंकेज के नाम से हो रहे करोड़ों का घोटाला के शीर्षक से खुलासा किया था। यह विशेष खोजी रिपोर्ट 4 पृष्ठों में था। इस खुलासे के बाद एसईसीएल एवं कोयला मंत्रालय में हड़कंप मच गया था । उसके बाद कोयला मंत्रालय ने जांच के आदेश दिए। आनन-फानन में जांच शुरू हुई और एसईसीएल के विभिन्न कालरियों से कोयला ले रहे सैकड़ों कंपनियों की जांच की गई जिसमें फर्जी कंपनियों व बंद पड़े फैक्ट्रियों के नाम से अवैध कोयला लिया जाना पाया गया था। उसके बाद 100 से भी अधिक कंपनियों का कोयला लिंकेज निरस्त किया गया था। फिर इस जांच को आगे बड़े पैमाने पर शुरू  किया गया होता तो उच्च अधिकारी एवं कोल माफियाओं के अरबों का कोयला घोटाला का खुलासा होने की संभावना थी इसलिए तत्कालीन कोयला मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे दिलीप रे जो 19 मार्च 1998 को कोयला मंत्री बने उसे इस जांच के चलते 13 अक्टूबर 1999 को कोयला मंत्रालय से हटा दिया गया था । (वे 1 वर्ष 208 दिन तक कोयला मंत्री रहे)। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि घोटालेबाज अधिकारियों और कोल माफियाओं की पहुंच कहां तक थी। 

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