शिवसेना पर दावे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फैसला देने से रोका, संवैधानिक पीठ को सौंपा जा सकता है मामला

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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

नई दिल्ली।  महाराष्ट्र में असली शिवसेना पर दावे को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह एकनाथ शिंदे गुट की इस याचिका पर फिलहाल कोई फैसला न करे कि उसे असली शिवसेना माना जाए और उसे पार्टी का चुनाव चिह्न दिया जाए। प्रधान न्यायाधीश एन वी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह महाराष्ट्र के हालिया राजनीतिक संकट से जुड़े मामलों को संविधान पीठ को भेजने पर सोमवार तक फैसला करेगी।

8 अगस्त को पीठ को सौंपा जा सकता है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वह 8 अगस्त को फैसला कर सकता है कि क्या महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट से जुड़े कुछ मुद्दों को पांच-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ को भेजा जाए या नहीं। वहीं, कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि अगर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला खेमा शिंदे खेमे की याचिका पर अपने नोटिस का जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगता है, तो उसे मामले को स्थगित करने के उनके अनुरोध पर विचार करना चाहिए।

इससे पहले बुधवार को दोनों गुटों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखी गईं। शिंदे गुट की ओर से कहा गया कि नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाना विद्रोह या दल बदल नहीं है। यह पार्टी के अंदर का विवाद है। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे गुट ने दलील दी कि शिवसेना के बागी विधायकों के आचरण से साफ है कि उन्होंने पार्टी छोड़ दी है। इसलिए कानून के मुताबिक सभी अयोग्य हो गए हैं और सदन में हुई सारी कार्यवाही यानी स्पीकर का चुनाव व मुख्यमंत्री की नियुक्ति तक सभी गैरकानूनी हैं। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शिंदे गुट से कहा कि वह अपने कानूनी सवाल फिर से तय करके स्पष्ट रूप से लिखित तौर पर कोर्ट को दे। 

 उद्धव गुट की दलील

  • संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रविधानों के तहत शिवसेना के बागी विधायक अयोग्य हो चुके हैं। अलग हुए गुट ने न तो किसी पार्टी में विलय किया है और न ही कोई अलग दल बनाया है।
  • उनका सारा आचरण पार्टी विरोधी है। वे अयोग्य हैं और स्वयं मूल शिवसेना होने का दावा कर रहे हैं।
  • शिंदे गुट द्वारा की गई सदन की सारी कार्यवाही गैरकानूनी है।

शिंदे गुट की दलील

  • पार्टी में मतभेद को दल बदल नहीं कहा जा सकता। दल बदल कानून तब लागू होता है जब कोई पार्टी छोड़े।
  • हमने पार्टी नहीं छोड़ी है। हम शिवसेना ही हैं। यहां विवाद नेतृत्व को लेकर है। नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाना दल बदल नहीं है।
  • हमारे देश में समस्या यह है कि यहां नेता को ही पार्टी समझ लिया जाता है। अगर पार्टी के ज्यादातर लोग यह कहते हैं कि उन्हें नेता पर विश्वास नहीं है तो इसमें दल बदल कहां से आ गया।
  • यहां पार्टी के दो गुटों की बात है, दो शिवसेना की बात नहीं है।

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