कृषि कानून और किसान आंदोलन के खिलाफ याचिकाओं पर 11 जनवरी को सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

Chhattisgarh Reporter
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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर          

नई दिल्ली 6 जनवरी 2021। कृषि कानूनों के विरोध में 40 दिनों से धरना दे रहे किसानों और सरकार के बीच सात दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक इसका कोई अंतिम नतीजा नहीं निकल सका है। इस बीच सुर्कीम कोर्ट ने किसानों की हालत पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी को सुनवाई करने का फैसला किया है। इनमें एक अर्जी किसानों के प्रदर्शन से संबंधित भी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अगुवाई वाली बेंच ने इस दौरान टिप्पणी की है कि किसानों के प्रदर्शन के मामले में ग्राउंड पर कोई बेहतर स्थिति नहीं दिख रही है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा कि सरकार और किसानों के बीच इस मामले में अच्छे वातारण में बातचीत चल रही है।

सरकार बोली- बातचीत जारी, निकल सकता है नतीजा

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि बातचीत जारी है और इस बात की अच्छी संभावना बन रही है कि भविष्य में बातचीत का नतीजा निकल सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार और किसानों के बीच बेहतर वातारण में बातचीत चल रही है और ऐसे में मामले की सुनवाई 8 जनवरी को न किया जाए बल्कि आगे किया जाए। पहले सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए आठ जनवरी की तारीख तय की थी लेकिन उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम स्थिति को समझ रहे हैं और चाहते हैं कि बातचीत हो और ऐसे में हम मामले की सुनवाई हम 11 जनवरी को करेंगे।

कई याचिकाएं की गई हैं दाखिल

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट एमएल शर्मा ने अर्जी दाखिल कर कृषि बिल को चुनौती दी है इस मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। शर्मा ने अर्जी में कहा है कि केंद्र सरकार को संविधान के तहत कृषि संबंधित मामले में कानून बनाने का अख्तियार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले में दाखिल तमाम अर्जी को साथ में सुनेंगे। गौरतलब है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले से ही कृषि बिल के खिलाफ दाखिल याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम चाहते हैं कि तमाम पेंडिंग मामले की सुनवाई साथ हो क्योंकि हम समझ रहे हैं कि स्थिति बेहतर नहीं हुआ है।

याचिकाओं में कृषि कानून पर उठाए गए हैं सवाल

गौरतलब है कि 12 अक्टूबर 2020 को कृषि कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा था। केंद्र सरकार के कृषि बिल को केरल के कांग्रेस सांसद, तामिलनाडु के डीएम के राज्यसभा के मेंबर. आरजेडी के मनोज झा समेत अन्य की ओर से अर्जी दाखिल की गई थी जिस पर पहले से नोटिस जारी हो चुका है। तमाम याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगााय गया है कि संसद से पारित किया गया कृषि कानून किसानों के कृषि उत्पादों का उचित मूल तय कराने के लिए बनाई गई कृषि उपज मंडी समिती व्यवस्था को खत्म कर देगा। अर्जी दाखिल कर फार्म एक्ट के संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। कांग्रेसी सांसद टीएन प्रथापन ने अर्जी दाखिल कर आरोप लगाया है कि फार्मर्स (इंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑफ प्राइस असोरेंस एंड फार्म सर्विस एक्ट 2020 संविधान के अनुच्छेद-14 यानी समानता के अधिकार, अनुच्छेद-15 यानी कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।

सरकार की मंशा पर भी उठाए प्रश्न

याचिकाकर्ता ने कहा है कि सरकार का दावा है कि नया कानून कृषि एग्रीमेंट पर नेशनल फ्रेमवर्क का प्रावधान वाला है। इसके तहत कृषि उत्पादनों की बिक्री, फार्म सर्विसों, कारोबार करने वाली फर्म, प्रोसेसर्स , थोक विक्रेताओं, खुदरा बिक्रेताओं और एक्सपोर्ट करने वाले किसानों को सशक्त बनाता है। नए कानून के तहत करार करने वाले किसानों को उत्कृष्ठ बीच की आपूर्ति सुनिश्चित करता है और तकनीकी सहायता मिलता है। साथ ही लोन की सुविधाएं मिलती है और फसल बीमा का लाभ मिलता है। याचिकाकर्ता की ओर से उनके वकील जे. पी. थॉमस ने अर्जी दाखिल की और उसमें कहा गया है कि भारत में एग्रीकल्चर का जो स्वरूप है वह खंडित वाला है यानी टुकड़ों में खेती होती है। किसान छोटे-छोटे हैं और उनका जोत भी छोटा है। भारतीय एग्रीकल्चर में कुछ ऐसी अंदर की कमजोरी है जिस पर किसी का कंट्रोल नहीं है। इनमें मौसम पर निर्भरता से लेकर बाजार की अनिश्चितता और उत्पादन को लेकर अनिश्चितता शामिल है। यानी खेती में निवेश से लेकर मैनेजमेंट दोनों में जोखिम काफी ज्यादा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि मौजूदा एक्ट के बदले सरकार को कृषि उपज विपणन समिति प्रणाली को ज्यादा सक्षम बनाया जाना चाहिए था। इसके तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य के मैनेजमेंट को प्रभावी तरीके से लागू करना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, प्रदर्शन का हक पर वह अहिंसक हो

सुप्रीम कोर्ट ने ने किसानों के प्रदर्शन के मामले में 17 दिसबंर को कहा था कि किसानों को प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन प्रदर्शन असिंहक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह एक स्वतंत्र व निष्पक्ष कमिटी बनाने के बारे में विचार कर रही है जिसमें एक्सपर्ट होंगे साथ ही सरकार और किसानों के प्रतिनिधि होंगे जो बातचीत के जरिये रास्ता निकालने का प्रयास करेंगे। अदालत ने कहा था कि कमिटी में पी. साईनाथ जैसे एक्सपर्ट को रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब किसानों के संगठन और सरकार के प्रतिनिधि बातचीत से रास्ता निकालें। हम इसके लिए कमिटी बनाकर सहूलियत प्रदान करना चाहते हैं।

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