अब यूपीआई-एनडीबी से ग्लोबल सिस्टम बदलने की तैयारी

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
नई दिल्ली, 09 सितंबर 2026। भारत इस हफ्ते ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है। इस दौरान नई दिल्ली की वैश्विक पहचान में एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है। अब भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिर्फ़ अपने लिए जगह और बड़ी भूमिका की मांग नहीं करता, बल्कि अपने घरेलू स्तर पर विकसित और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले समाधानों के जरिए वैश्विक व्यवस्था को सक्रिय रूप से आकार देने की कोशिश कर रहा है। 2012 में जब दुनिया यूरोजोन के कर्ज संकट से जूझ रही थी, तब भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी। इसके बाद 2016 में ब्रेक्जिट से पैदा हुई अनिश्चितताओं के बीच भी भारत ने समूह की कमान संभाली। इन दोनों मौकों पर भारत ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की लगातार वकालत की। बराबरी और बेहतर प्रतिनिधित्व की ये शुरुआती मांगें आगे चलकर न्यू डेवलपमेंट बैंक और कॉन्टिंजेंट रिज़र्व एग्रीमेंट जैसे मजबूत संस्थागत ढांचों के रूप में सामने आईं। इसी दौर में रेनमिनबी यानी चीनी मुद्रा में पहला ग्रीन बॉन्ड जारी करने जैसी पहल भी हुई।
2021 में बदली रणनीति, वैक्सीन डिप्लोमेसी पर जोर
फिर आया साल 2021 और दुनिया के सामने एक बिल्कुल अलग तरह का वैश्विक संकट था। COVID-19 महामारी ने वैश्विक व्यापार और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था। ऐसे समय में भारत ने वैक्सीन को भू-राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के बजाय ‘वैक्सीन डिप्लोमेसी’ का रास्ता चुना। भारत ने विकासशील देशों के साथ ओपन-सोर्स डिजिटल हेल्थ रिपॉज़िटरी यानी स्वास्थ्य संबंधी डेटा के खुले भंडार साझा किए। महामारी ने अर्थव्यवस्थाओं और सप्लाई चेन को बुरी तरह बाधित कर दिया था और वैक्सीन तक पहुंच भी एक बड़े भू-राजनीतिक मुद्दे में बदल गई थी। ऐसे माहौल में भारत ने खुद को सिर्फ़ वैश्विक सहयोग का लाभ उठाने वाले देश के तौर पर नहीं, बल्कि समाधान पेश करने वाले देश के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।
2026 में भारत की नई प्राथमिकताएं
पांच साल बाद, 2026 में भारत एक बार फिर ब्रिक्स की कमान संभाल रहा है। इस बार इसकी थीम है- ‘मजबूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण'(बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस इनोवेशन कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी )। भारत अपने घरेलू अनुभवों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को एक साथ जोड़ रहा है, ताकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को और मजबूत किया जा सके।
ब्रिक्स में भारत का सफर घरेलू विकास से जुड़ा
एएनआई के साथ एक इंटरव्यू में ब्रिक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के चेयरमैन समीप शास्त्री ने बताया कि शुरुआती वर्षों में, जाहिर तौर पर हमारा ध्यान वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अधिक बड़ी आवाज और बेहतर प्रतिनिधित्व हासिल करने पर था। जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार और विकास हुआ, बातचीत अपने खुद के सिस्टम और संस्थान बनाने की दिशा में आगे बढ़ी। ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ का गठन इस दिशा में एक अहम कदम था। आज भारत के पास डिजिटल पेमेंट, फाइनेंशियल इन्क्लूजन (वित्तीय समावेशन), स्टार्टअप, रिन्यूएबल एनर्जी और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे क्षेत्रों में व्यापक अनुभव है। भारत अब सिर्फ़ यह नहीं पूछ रहा है कि वैश्विक व्यवस्था को कैसे बदला जाना चाहिए, बल्कि वह यह भी बता सकता है कि उसके लिए क्या काम किया है। शास्त्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि ब्रिक्स के भीतर विचारों का आदान-प्रदान एकतरफा नहीं है। सदस्य देश एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं और अपने-अपने स्तर पर उन्हें अपनाने की संभावनाएं तलाशते हैं।
यूपीआई से डिजिटल समावेशन तक भारत का मॉडल
यह बताते हुए कि भारतीय आर्थिक मॉडल ब्रिक्स के इनोवेशन और मजबूती के विज़न को किस तरह आगे बढ़ा सकते हैं, शास्त्री ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भारत के अग्रणी काम का उल्लेख किया। इसमें यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस की भूमिका विशेष रूप से अहम रही है। यूपीआई जैसे प्लेटफॉर्म ने दिखाया है कि टेक्नोलॉजी किस तरह लाखों लोगों को औपचारिक डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ सकती है। लेकिन भारत का अनुभव सिर्फ़ डिजिटल पेमेंट तक सीमित नहीं है। यह फाइनेंशियल इन्क्लूजन, MSME, रिन्यूएबल एनर्जी और किफायती हेल्थकेयर तक फैला हुआ है। ये सभी ऐसे क्षेत्रों में विकसित किए गए समाधान हैं, जहां भारत को अपनी विशाल और विविध आबादी के सामने आने वाली वास्तविक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
खुले और इंटरऑपरेबल डिजिटल सिस्टम पर जोर
शास्त्री ने कहा कि भारत का डिजिटल रोलआउट दूसरे देशों के लिए एक बुनियादी खाका पेश करता है। इसमें डिजिटल एक्सेस को निजी या किसी एक कंपनी के मालिकाना हक वाले प्लेटफॉर्म तक सीमित रखने के बजाय खुले और इंटरऑपरेबल सिस्टम तैयार किए जाते हैं। हर किसी के लिए एक ही तरीका काम नहीं कर सकता। मैं BRICS को इस तरह के आदान-प्रदान के लिए एक उपयोगी मंच के रूप में देखता हूं। सरकारें, वित्तीय संस्थान, टेक्नोलॉजी कंपनियां और स्टार्टअप एक-दूसरे से सीख सकते हैं और साझेदारी की संभावनाएं तलाश सकते हैं।
मांग करने वाले देश से समाधान देने वाले देश तक
शास्त्री की बातें ब्रिक्स में भारत की बदलती भूमिका को रेखांकित करती हैं। यह एक ऐसा सफर है, जो नई दिल्ली द्वारा मुख्य रूप से विकसित देशों के बनाए संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अधिक आवाज़ और प्रतिनिधित्व की मांग से शुरू हुआ था। अब यह सफर इस बात को साबित करने की दिशा में बढ़ रहा है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं खुद भी संस्थान बना सकती हैं, इनोवेशन कर सकती हैं और व्यावहारिक एवं काम करने लायक विकल्प पेश कर सकती हैं।
NDB से DPI तक भारत की बढ़ती भूमिका
न्यू डेवलपमेंट बैंक से लेकर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर तक, वैक्सीन डिप्लोमेसी से लेकर मजबूत सप्लाई चेन तक, भारत की ब्रिक्स कहानी तेजी से एक ऐसे देश की तस्वीर पेश कर रही है, जो वैश्विक मंच पर सिर्फ़ अपने लिए जगह नहीं मांग रहा, बल्कि अपने अनुभव और समाधान भी साथ लेकर आ रहा है।

