26 साल में 25 बैठकें फिर भी जलवायु परिवर्तन रोकने में नाकाम, भारत-चीन की छवि भी बिगड़ी

Chhattisgarh Reporter
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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर  

नई दिल्ली 25 अक्टूबर 2021। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के तहत अब तक 25 बैठक हो चुकी हैं। निकाय ने 1995 में पहली बार जलवायु परिवर्तन पर बैठक की थी, लेकिन निकाय 26 साल में 25 बैठकों के बाद भी जलवायु परिवर्तन रोकने में नाकाम रहा। अब 31 अक्तूबर से 26वीं बैठक (कॉप-26) प्रस्तावित है, इसका प्रभाव क्या रहेगा, यह अब समय ही बताएगा। निकाय की तरफ से पहली बैठक के बाद से अब तब 894 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संधियां व्यक्ति और राज्य के बीच संबंधों के लिए व्यापक रूप से वैश्विक मानक निर्धारित करती हैं, लेकिन हस्ताक्षरकर्ता भी अक्सर उन्हें बेकार कागजी वादों के रूप में मानते हैं। महिला शांति और सुरक्षा सूचकांक के तहत लैंगिक समानता के लिए सबसे कम रेटिंग वाले 10 देशों में से नौ ने महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन की पुष्टि की है।

कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों पर अधिक जिम्मेदारी

कन्वेंशन के तहत समस्या को जटिल बनाने के लिए अलग-अलग राष्ट्रों के आगे बढ़ने के तरीकों को गहराई से बांटा गया है। दुनिया के सात विकसित देश कार्बन उत्सर्जन के सबसे अच्छे उदाहरण है। विकसित और विकासशील देशों ने 53 फीसदी कार्बन का उत्सर्जन किया है, लेकिन कार्बन उत्सर्जन रोकने की जिम्मेदारी उन देशों पर अधिक है, जो विकसित देशों की तुलना में बहुत कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं।

चीन और भारत की छवि बिगड़ी

चीन, भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जी-77 का प्रतिनिधित्व करते हैं। अकसर इन देशों को संधियों को तोड़ने वाले देशों के रूप में चित्रित किया जाता है। ये देश प्रदूषित करने की क्षमता पर बाधाओं को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। इसके साथ ही वे अमीर देशों को अपने कार्बन उत्सर्जन में तेजी से कटौती करने का तर्क देते हैं। वहीं, जी-7 देश कार्बन उत्सर्जन का सारा दोष विकासशील देशों पर मढ़ देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि उनके पास इसका कोई विकल्प नहीं है।

कुछ अहम बातें

  • क्योटो प्रोटोकॉल का मूल सार जी-7 प्लस देश में था। यह पूर्व सोवियत संघ, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच एक संधि थी।
  • क्योटो प्रोटोकॉल, जिसे व्यापक रूप से एक विफल माना जाता था, लेकिन कई मायनों में यह एक सफलता थी।
  • समझौते में बने रहने वाले देशों ने 1990 (3) के बाद के दो दशकों में उत्सर्जन में पांच फीसदी की कमी के लक्ष्य को पूरा नहीं किया
  • इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी का फीसदी धीरे-धीरे बढ़ते गया। यह 11 फीसदी की कमी के साथ ही 2019 तक 17 फीसदी तक हो गया।

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