बंगाल में OBC पर शुभेंदु सरकार का बड़ा फैसला: धर्म आधारित आरक्षण व्यवस्था खत्म; 66 समुदायों को फिर मिला लाभ

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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

कोलकाता 20 मई 2026। पश्चिम बंगाल की शुभेंदु सरकार ने मंगलवार को बड़ा फैसला लेते हुए धर्म के आधार पर बनाई गई ओबीसी श्रेणियों को खत्म कर दिया और 2010 से पहले ओबीसी सूची में शामिल 66 समुदायों को फिर से सात प्रतिशत आरक्षण का लाभ देने का एलान किया। यह फैसला पश्चिम बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के बाद लिया है।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के बाद फैसला
दरअसल, मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2010 से 2012 के बीच ओबीसी सूची में जोड़े गए 77 समुदायों को असंवैधानिक बताते हुए उनका ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि इन समुदायों को बिना सही सामाजिक और आर्थिक सर्वे के सूची में शामिल किया गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने मौजूदा ओबीसी सूची को खत्म कर नई व्यवस्था लागू की है। नई सूची के तहत अब 66 समुदायों को एक ही श्रेणी में रखकर सरकारी नौकरियों और सेवाओं में 7 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा। इनमें कपाली, कुर्मी, कर्मकार, सूत्रधार, स्वर्णकार, नाई, तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, देवांगा और गोआला जैसे कई समुदाय शामिल हैं। इस सूची में तीन मुस्लिम समुदाय – पहाड़िया, हज्जाम और चौदुली – को भी जगह दी गई है।

बंगाल में पहले दो हिस्सों बांटा गया था ओबीसी आरक्षण
पहले राज्य में ओबीसी आरक्षण को दो हिस्सों में बांटा गया था। कैटेगरी-ए को ‘अधिक पिछड़ा’ मानते हुए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता था, जबकि कैटेगरी-बी को 7 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। अब इस व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है। इस फैसले से करीब 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र प्रभावित हुए हैं, जो 2010 के बाद जारी किए गए थे। हालांकि हाई कोर्ट ने पहले से नौकरी पा चुके लोगों की नियुक्तियां सुरक्षित रखी हैं और 2010 से पहले जारी प्रमाणपत्रों को वैध माना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राज्य की राजनीति और सामाजिक समीकरणों पर बड़ा असर डाल सकता है। पूर्व नौकरशाह जवाहर सिरकार ने कहा कि पहले बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था, लेकिन इसके पीछे मजबूत सामाजिक-आर्थिक सर्वे नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि इन समुदायों को वोट बैंक की राजनीति के तहत जोड़ा गया। सामाजिक न्याय से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि इस बदलाव के बाद मुस्लिम समुदायों की सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में हिस्सेदारी कम हो सकती है, क्योंकि अब उन्हें सामान्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी। आने वाली जनगणना को देखते हुए इस फैसले को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य में जातीय और सामाजिक आंकड़ों की राजनीति पर भी असर पड़ सकता है।

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