फिल्म रिव्यू: “हाय ज़िंदगी”

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कानून और समाज को आईना दिखाती साहसिक कहानी

(अनिल बेदाग)

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

मुंबई 15 नवंबर 2025। बॉलीवुड में नए विषयों और साहसिक प्रयोगों का चलन तेज़ हो चुका है। इसी कड़ी में निर्देशक अजय राम की फिल्म “हाय ज़िंदगी” एक ऐसा मुद्दा उठाती है, जो आज के समाज और कानून—दोनों के लिए बेहद प्रासंगिक है। सी.आर. फिल्म्स और सुनील अग्रवाल फिल्म्स के बैनर तले बनी यह फिल्म 14 नवंबर 2025 को रिलीज़ हुई और अपने अनूठे विषय के कारण चर्चा में है।

रेटिंग: (3 स्टार्स)

फिल्म की कहानी वरुण (गौरव सिंह) से शुरू होती है, जो एक अमीर बिजनेसमैन गुप्ता जी के ऑफिस में काम करता है। गुप्ता जी की बेटी पलक (गरिमा सिंह) अपनी दोस्तों—मेघा (आयुषी तिवारी), ज्योति (सोमी श्री) और नंदिनी (दीपांशी त्यागी)—के साथ एक पार्टी रखती है, जहां वरुण को भी बुलाया जाता है। मज़ाक-मस्ती का माहौल देखते-देखते खतरनाक मोड़ ले लेता है। वरुण को शराब और ड्रग्स देकर चारों लड़कियां उसका शारीरिक शोषण करती हैं। वरुण की “मुझे जाने दो” की पुकार अनसुनी रह जाती है। जब वह होश में आता है और पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत करता है, तो उस पर हंसा जाता है।

“ओ तेरी… ये कब से होने लगा?”

यहीं से शुरू होता है उसका संघर्ष और फिल्म का असली संदेश। फिल्म यह दिखाती है कि भारतीय कानून ‘पीड़ित’ की परिभाषा को सिर्फ महिलाओं तक सीमित रखता है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। समाज में यह धारणा मजबूत है कि जबरदस्ती सिर्फ पुरुष ही करता है, लेकिन फिल्म इस सोच को चुनौती देती है और जेंडर न्यूट्रल कानूनों की ज़रूरत को मजबूती से रखती है।

निर्देशक अजय राम ने एक कठिन विषय को बेहद संतुलन और ईमानदारी से पेश किया है। क्रूर दृश्य भी बिना अतिशयोक्ति के दिखाए गए हैं। कई सीन्स में बिना संवाद के सिर्फ बैकग्राउंड म्युज़िक से प्रभाव पैदा करना काबिल-ए-तारीफ है। चारों लड़कियों और वरुण के बीच के दृश्यों को निर्देशक ने बेहद सटीकता से गढ़ा है। गौरव सिंह (वरुण) ने पूरी फिल्म का भावनात्मक भार अपने कंधों पर उठाया है। उनका डर, टूटन, गुस्सा और संघर्ष खूबसूरती से उभरता है। गरिमा सिंह (पलक) अपने किरदार की जटिलता को बखूबी निभाती हैं। आयुषी तिवारी, सोमी , दीपांशी त्यागी और ऋषभ शर्मा भी कहानी में ऊर्जा और वास्तविकता जोड़ते हैं। फिल्म के गाने कहानी के मूड के अनुरूप हैं। दानिश अली, आदित्य राज शर्मा, प्रतीक लाल जी और उमर शेख की धुनें प्रभावी हैं। गीतकारों ने किरदारों की भावनाओं को अपने शब्दों में अच्छी तरह पिरोया है। बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों को और गहरा बनाता है।

“हाय ज़िंदगी” एक ऐसी फिल्म है, जो मनोरंजन के साथ-साथ मौजूदा सिस्टम और मानसिकता पर गंभीर सवाल भी उठाती है। एक साहसिक और सोचने पर मजबूर कर देने वाली कहानी के लिए यह फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।

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