यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर दिखता है असर, डॉक्टर से जानें सच्चाई

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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

नई दिल्ली 09 नवंबर 2025। भारत में डायबिटीज अब सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, बल्कि तेजी से युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही है। हाल की ICMR–India Diabetes 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर छठा डायबिटीज मरीज 40 साल से कम उम्र का है। इतनी कम उम्र में डायबिटीज होना भविष्य में कई गंभीर बीमारियों की जड़ बन सकता है। इन्हीं में से एक है डायबिटिक रेटिनोपैथी (Diabetic Retinopathy), जो धीरे-धीरे आंखों की रोशनी छीन लेती है।

 क्या है डायबिटिक रेटिनोपैथी?

डायबिटिक रेटिनोपैथी एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लगातार बढ़ते या घटते ब्लड शुगर लेवल के कारण आंख की रेटिना की छोटी रक्त नलिकाएं (ब्लड वेसल्स) कमजोर होने लगती हैं। रेटिना आंख का वह नाजुक हिस्सा है जो रोशनी को महसूस करता है और हमें चीजें साफ दिखाई देती हैं। जब शुगर लंबे समय तक कंट्रोल में नहीं रहती, तो इन वेसल्स में सूजन, लीकेज या ब्लीडिंग होने लगती है। धीरे-धीरे नई और असामान्य ब्लड वेसल्स बनने लगती हैं जो रेटिना पर दबाव डालती हैं। अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह स्थिति स्थायी अंधेपन तक ले जा सकती है।

यंग पेशेंट्स के लिए बढ़ता खतरा

कम उम्र में डायबिटीज होने पर यह खतरा और बढ़ जाता है। क्योंकि जितना लंबा समय किसी को डायबिटीज रहती है, उतनी ही ज्यादा संभावना होती है कि उसका असर रेटिना पर पड़े।ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी 2025 के आंकड़ों के अनुसार  40 साल से कम उम्र के करीब 12 से 15 प्रतिशत डायबिटीज मरीजों में रेटिनोपैथी के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगते हैं। शुरुआत में इसके लक्षण नजर नहीं आते, इसलिए कई मरीजों को तब तक पता नहीं चलता जब तक नुकसान बहुत बढ़ नहीं जाता। यही वजह है कि एक्सपर्ट्स हर डायबिटीज पेशेंट को साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच (Eye Screening) कराने की सलाह देते हैं।

आधुनिक लाइफस्टाइल बन रही है आंखों की दुश्मन

आज की तेज रफ्तार जिंदगी ने हमारी आदतों को पूरी तरह बदल दिया है। फास्ट फूड, नींद की कमी, लगातार मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखना, तनाव और फिजिकल एक्टिविटी की कमी  ये सब ब्लड शुगर को अनियंत्रित कर देती हैं। जब ब्लड शुगर लंबे समय तक हाई रहती है, तो रेटिना तक ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई घट जाती है। इससे रेटिना की कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इंफ्लेमेशन (सूजन) बढ़ जाती है। अगर इसके साथ ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल या स्मोकिंग जैसी समस्याएं जुड़ जाएं, तो आंखों की रोशनी पर खतरा और तेज हो जाता है।

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