बोले- इससे दूर रहें, दिल-दिमाग में नफरत भरती है,सनातन को बताया अलग

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
भोपाल, 05 नवंबर 2026। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने हिंदुत्व को लेकर एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिस पर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। उन्होंने हिंदुत्व को नफरत से जोड़ते हुए लोगों को इससे दूर रहने की सलाह दी। साथ ही सनातन धर्म और हिंदुत्व को अलग-अलग विचार बताते हुए कहा कि सनातन धर्म का वास्तविक संदेश पूरी दुनिया को एक परिवार मानने का है। दिग्विजय सिंह ने यह बात अपनी सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा के दौरान राघौगढ़ में आयोजित सभा में कही। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म को हिंदुत्व के रूप में पेश किया जा रहा है। ऐसा करने से लोगों के मन में गलत धारणा बन रही है। यदि सनातन धर्म का सही अर्थ नहीं समझाया गया तो लोग हिंदुत्व की ओर चले जाएंगे।
हिंदुत्व को नफरत से जोड़कर घेरा
दिग्विजय सिंह ने कहा कि हिंदुत्व की तरफ जाने वालों के दिल और दिमाग में नफरत होती है। उन्होंने सनातन धर्म को इससे अलग बताते हुए कहा कि सनातन का अर्थ पूरे विश्व को एक परिवार मानना है। सनातन धर्म की मूल भावना प्रेम, सद्भाव और सबको साथ लेकर चलने की है। इसे सही तरीके से लोगों के सामने रखने की जरूरत है।
80 साल की उम्र में 1000 किलोमीटर की यात्रा
दिग्विजय सिंह उज्जैन से अयोध्या तक करीब 1000 किलोमीटर की सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा निकाल रहे हैं। यात्रा के दौरान वह अपने गृह नगर राघौगढ़ पहुंचे। यहां उनके बेटे और कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने परिवार के साथ यात्रा का स्वागत किया। सभा के दौरान उनका पूरा परिवार मंच पर मौजूद था। दिग्विजय सिंह ने यात्रा के दो प्रमुख उद्देश्य बताए। पहला, देश में लोकतंत्र की जगह एकतंत्र को बढ़ावा दिए जाने का विरोध और दूसरा, सनातन धर्म के नाम पर हिंदुत्व को आगे बढ़ाने की कोशिशों का विरोध।
ईवीएम हटाकर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग
सभा में दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वोट चोरी के जरिए लोकतंत्र को मजबूत नहीं किया जा सकता। उन्होंने ईवीएम से चुनाव कराने पर रोक लगाने और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग दोहराई।
राम मंदिर के चंदे का भी उठाया हिसाब
दिग्विजय सिंह ने राम मंदिर के नाम पर जुटाए गए चंदे का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि मंदिर के लिए करीब 1400 करोड़ रुपये का चंदा जुटाया गया था। उनके अनुसार, 1992 में महंत लालदास ने जब राम मंदिर के लिए जुटाई गई राशि का हिसाब मांगा था, तब 8.29 करोड़ रुपये का हिसाब बताया गया था। उन्होंने धार्मिक संस्थाओं में चंदे और चढ़ावे के उपयोग में पारदर्शिता की जरूरत बताई।


