निडाल हसन की मौत की सजा पर ट्रंप की मुहर

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
वाशिंगटन, 06 अक्टूबर 2026। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2009 में टेक्सास के फोर्ट हूड सैन्य अड्डे पर गोलीबारी कर 13 लोगों की जान लेने वाले सेना के मेजर निडाल मलिक हसन को फायरिंग स्क्वॉड के जरिए मौत की सजा देने को मंजूरी दे दी है। अमेरिकी सेना में 1961 के बाद से अब तक किसी को फांसी या अन्य तरीके से मृत्युदंड नहीं दिया गया है। पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि अब सेना के सचिव फांसी की तारीख और जगह तय करेंगे।
‘हसन के लिए आखिरकार फैसला का दिन आ गया’
पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने एक्स पर लिखा, ‘हसन के लिए आखिरकार फैसला का दिन आ गया है।’ हसन उस समय अमेरिकी सेना में मनोचिकित्सक था। 2009 में वह फोर्ट हूड के एक मेडिकल सेंटर में पहुंचा, जहां सैनिक मेडिकल जांच के लिए मौजूद थे। उसने अचानक गोलियां चलानी शुरू कर दीं।
गोली चलाने से पहले चिल्लाया था ‘अल्लाहु अकबर’
हसन ने लेजर से निशाना साधने वाली पिस्तौल से सैनिकों पर गोलियां बरसाईं। इस हमले में 13 लोगों की मौत हो गई, जबकि 30 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। गोलीबारी शुरू करने से पहले उसने ‘अल्लाहु अकबर’ कहा था, जिसका अर्थ है ‘ईश्वर महान है।’
‘अपने ही लोगों को मारने से रोकना चाहता था’
हसन ने बाद में कहा था कि उसने यह हमला इसलिए किया क्योंकि वह अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान जाने और वहां अपने मुस्लिम साथियों को मारने से रोकना चाहता था। मुकदमे के दौरान उसने खुद को बचाने की लगभग कोई कोशिश नहीं की। उसने जूरी के सामने माना था कि गोली चलाने वाला वही था और खुद को ऐसा सैनिक बताया था जिसने ‘पाला बदल लिया।’
फांसी अभी तुरंत नहीं होगी, कानूनी रास्ता खुला
ट्रंप की मंजूरी का मतलब यह नहीं है कि हसन को तुरंत मौत की सजा दे दी जाएगी। फैसले के बाद कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं। हसन इस प्रक्रिया को लंबे समय तक रोकने की कोशिश कर सकता है। इसके लिए वह अमेरिकी संघीय अदालत में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर कर सकता है। मई में प्रकाशित आर्मी लॉयर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी कानूनी लड़ाई कई साल तक चल सकती है।
अमेरिकी सैन्य इतिहास में मौत की सजा बेहद दुर्लभ
अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था में मौत की सजा मिलना ही बेहद दुर्लभ है और उसे अमल में लाना उससे भी ज्यादा असामान्य रहा है। फिलहाल सेना की डेथ रो में चार लोग हैं, जिनमें हसन भी शामिल है। इन सभी को कंसास के फोर्ट लीवेनवर्थ में रखा गया है।
2008 में भी राष्ट्रपति ने दी थी मंजूरी, लेकिन सजा नहीं हुई
इससे पहले राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने 2008 में सेना के जवान रोनाल्ड ग्रे की फांसी को मंजूरी दी थी। हालांकि, एक जज के आदेश के बाद उस सजा पर रोक लग गई और ग्रे आज भी फोर्ट लीवेनवर्थ में बंद है। इससे साफ है कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बावजूद सैन्य मृत्युदंड को अमल में लाने की प्रक्रिया लंबी कानूनी लड़ाई में फंस सकती है।
1961 के बाद सेना में किसी को नहीं दी गई मौत की सजा
अमेरिकी सैन्य व्यवस्था में आखिरी बार 1961 में मौत की सजा पर अमल हुआ था। उस समय प्राइवेट जॉन बेनेट को 11 साल की बच्ची से बलात्कार के मामले में फांसी दी गई थी। उसके बाद से अमेरिकी सेना में किसी मौत की सजा को अमल में नहीं लाया गया।
ट्रंप ने फिर से मृत्युदंड की नीति को आगे बढ़ाया
हसन की सजा को मंजूरी ऐसे समय में दी गई है जब अमेरिका में मृत्युदंड को लेकर एक बार फिर बहस तेज है। ट्रंप ने पिछले कार्यकाल के दौरान संघीय स्तर पर मृत्युदंड पर लगी अनौपचारिक रोक को खत्म किया था। 2020 से 2021 की शुरुआत तक संघीय सरकार ने 13 लोगों को मौत की सजा दी थी। इन फांसियों की वजह से ट्रंप 130 साल से ज्यादा समय में सबसे ज्यादा लोगों को फांसी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपतियों में शामिल हो गए।
टेनेसी में फांसी की कोशिश नाकाम होने के बाद आया फैसला
ट्रंप की ओर से हसन को फायरिंग स्क्वॉड से मौत देने की मंजूरी टेनेसी में क्रिस्टा पाइक को जहरीले इंजेक्शन के जरिए मौत की सजा देने की नाकाम कोशिश के कुछ ही दिनों बाद आई है। इस घटना के बाद टेनेसी के गवर्नर ने इस साल आगे होने वाली सभी फांसियों पर रोक लगा दी और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच के आदेश दिए।
‘जहरीले इंजेक्शन से सजा देना मुश्किल नहीं होना चाहिए’
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या टेनेसी में हुई नाकाम कोशिश के बाद वह मृत्युदंड की प्रक्रिया में बदलाव की मांग करेंगे, तो उन्होंने इसे ‘दिलचस्प स्थिति’ बताया। हालांकि, उन्होंने कहा कि जहरीले इंजेक्शन के जरिए मौत की सजा देना ‘बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए।’


