
छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
नई दिल्ली 19 जून 2026। माधुरी दीक्षित इन दिनों हालिया रिलीज फिल्म ‘मां बहन’ को लेकर चर्चा में हैं। अमर उजाला से हुई इस खास बातचीत में उन्होंने सिर्फ आज के दौर पर ही बात नहीं की, बल्कि उस दौर को भी याद किया जब इंडस्ट्री में उन्हें सुनना पड़ता था कि ‘ये लड़की नहीं चलेगी।
मां की बात हमेशा याद रही
करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए माधुरी ने बताया, ‘जब मैंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी, तब मैं उस दौर की बनी-बनाई हीरोइनों जैसी नहीं दिखती थी। इस वजह से कई बातें होती थीं। लोग कहते थे ये बहुत पतली है, ये कैसे चलेगी? नहीं हो पाएगा। लेकिन उस वक्त मेरी मां मेरे साथ खड़ी रही। वो हमेशा एक बात कहती थीं कि लोग आज जिस चीज के लिए तुम्हारी आलोचना कर रहे हैं, कल वही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बनेगी।’
लोगों ने मन में डाली असुरक्षाएं
जब माधुरी से पूछा गया कि क्या कभी उन्होंने खुद असुरक्षा महसूस की? तो अभिनेत्री ने कहा, ‘आज मैं खुद के साथ पूरी तरह सहज हूं। लेकिन असुरक्षाएं तब थीं जब मैंने नया-नया काम शुरू किया था। उस समय कुछ लोगों ने मेरे मन में असुरक्षाएं डालने की कोशिश की थी। लेकिन मेरी मां चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ी थीं। वो हर बार मेरी हर असुरक्षा को वहीं खत्म कर देती थीं।
हीरो की फिल्म को कोई नाम नहीं देता
हिंदी सिनेमा में महिलाओं को लेकर बदलती सोच पर बात करते हुए माधुरी ने एक ऐसा सवाल उठाया, जिस पर इंडस्ट्री में बहस हो सकती है। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है ‘मां बहन’ जैसी फिल्में इस बात का संकेत हैं कि अब चीजें बदल रही हैं। आज हमारे पास ऐसे लेखक और निर्देशक हैं जो महिलाओं को कहानी के केंद्र में रखकर काम कर रहे हैं। लेकिन एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आती। जब किसी हीरो की फिल्म आती है तो कोई उसे अलग नाम नहीं देता, लेकिन जैसे ही हीरोइन कहानी के केंद्र में होती है, फिल्म को तुरंत ‘फीमेल सेंट्रिक’ कह दिया जाता है। आखिर ऐसा क्यों?
मैं कभी एक जैसी रही ही नहीं
फिल्म ‘मां बहन’ के बाद कहा जा रहा है कि क्या माधुरी अपनी एक नई पहचान गढ़ रही हैं? इसके जवाब में एक्ट्रेस ने कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है। जब लोग मुझे धक धक गर्ल कहते थे, तब भी मैंने ‘मृत्युदंड’, ‘पुकार’ और ‘लज्जा’ जैसी फिल्में की थीं। मैं हमेशा वही करना चाहती हूं जो मैंने पहले कभी न किया हो। यही चीज मुझे आगे बढ़ाती है। मैं हमेशा खुद को बदलते रहना चाहती हूं। अगर लोगों को अब ऐसा लग रहा है तो मुझे खुशी है।
बचपन का अनुभव फिल्म से जुड़ गया
फिल्म के सामाजिक पहलू पर बात करते हुए माधुरी ने बचपन की एक याद साझा की। उन्होंने कहा, ‘हम बहुत जल्दी लोगों को देखकर राय बना लेते हैं। मुझे याद है हमारे अपार्टमेंट में नीचे एक महिला रहती थीं। वो अकेली रहती थीं, साड़ी पहनती थीं, चश्मा लगाती थीं, होली खेलना पसंद नहीं था, दिवाली पर बाहर नहीं आती थीं। बहुत निजी जिंदगी जीती थीं और घर की खिड़कियां भी बंद रहती थीं। फिर लोग कहते थे उनसे बात मत करना, उनके पास मत जाना। हम बच्चे खिड़की से झांककर सोचते थे कि आखिर ऐसा क्या रहस्य है। मुझे लगता है जिस चीज को हम समझ नहीं पाते, उसके बारे में हम अपनी तरफ से कहानी बनाना शुरू कर देते हैं। जब मैंने यह स्क्रिप्ट सुनी तो मुझे लगा यह फिल्म तो मुझे करनी ही है।


