आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में झूठ परोसा गया, जमीनी हकीकत कागजी दावों से उलट – दीपक बैज

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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

रायपुर 24 फरवरी 2026। आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में सरकार ने चतुराई से अपनी नाकामी और असल आंकड़ों को छुपाया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि ज़मीन हकीकत सरकार के कागजी दावों से बिल्कुल अलग है, पिछले बजट में छात्रवृत्ति के लिए आबंटित राशि का एक नया पैसा भी छात्रों को नहीं मिला। मुख्यमंत्री के गृह जिले कुनकुरी में मेडिकल कॉलेज की घोषणा हुई थी, अब तक एक पत्थर भी नहीं रखा गया। स्कूलों में 60 हजार से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं, लेकिन यह सरकार हर बार केवल घोषणा करती है, नई भर्तियां जानबूझकर रोक रखी है। 10463 स्कूल बंद कर दिये, स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट स्कूल सरकार की उपेक्षा से बदहाल है, सुपबेड़ा में एक बार फिर लोग आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त पानी पीने मजबूर हैं। अस्पतालों में जांच, इलाज और दवा के अभाव में मरीज बेमौत मरने मजबूर हैं। आयुष्मान योजना से इलाज का भुगतान नहीं होने से निजी अस्पतालों में मरीजों को लाभ नहीं मिल रहा है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि किसी भी सरकार के लिए बजट प्रावधान विजन डॉक्यूमेंट होता है, आने वाले वर्ष के लिए सरकार की प्राथमिकताओं और कार्ययोजना का ब्लूप्रिंट होता है, लेकिन भाजपा सरकार की दुर्भावना ने बजट के महत्व को कम कर दिया है, जुमलेबाज सरकार में बजट केवल कागजी आंकड़ा बन कर रह गया है। पिछले दो बजट में जो घोषणाएं इस सरकार ने की, हकीकत उससे कोसों दूर है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई और कृषि जैसे महत्वपूर्ण आठ विभागों में बजट प्रावधान का दस हजार करोड़ से अधिक की राशि खर्च ही नहीं किया गया।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि सरकार की गलत नीतियों की वजह से आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रहा है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय की गणना के लिए कुल निवल राज्य घरेलू उत्पाद या कुल आय को राज्य की कुल जनसंख्या से भाग दिया जाता है। सत्ता के संरक्षण में कुछ कमीशनखोर और भ्रष्टाचारियों की इनकम तो जरूर बढ़ी है, लेकिन आम जनता और गरीब हो रही है। किसान आत्महत्या करने मजबूर हैं, युवा रोजगार मांग रहे हैं, कर्मचारी आंदोलन पर है और महिलाएं महंगाई से पीड़ित है। घरेलू बचत ऐतिहासिक तौर पर न्यूनतम स्तर पर आ गया है लेकिन चुनिंदा लोगों की आय में बेतहाशा वृद्धि होने के कारण औसत तो बढ़ा है पर उसमें आम आदमी की हिस्सेदारी घटी है। जीडीपी की गणना के मूल्यांकन के लिए उत्पादन के स्थान पर एमआरपी और करों को भी शामिल करके बढ़ा कर किया गया है। वास्तविक जीडीपी, सरकारी दावे से लगभग 3 प्रतिशत कम है। असलियत यह है कि यह सरकार वित्तीय प्रबंधन में पूरी तरह नाकाम हो चुकी है, राज्य पर कुल कर्ज का भार लगातार बढ़ रहा है, राहत, रियायत और सब्सिडी केवल सरकार के चहेतो तक सीमित है।

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