“मेरे भीतर का कृष्ण”- रंगमंच पर उतरती चेतना की दिव्य यात्रा

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(अनिल बेदाग)

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

मुंबई 30 दिसंबर 2025। भारतीय रंगमंच जब आस्था, दर्शन और आधुनिक दृश्यात्मक तकनीक के संगम से जन्म ले, तो वह केवल नाटक नहीं रहता। वह एक अनुभूति बन जाता है। ऐसी ही एक गहन और आत्मिक अनुभूति का नाम है “मेरे कृष्ण”, जो श्रीकृष्ण की दिव्य यात्रा को रंग, राग और संवेदना के माध्यम से मंच पर साकार करता है। करीब 2 घंटे 45 मिनट की अवधि वाला यह भव्य नाट्य प्रस्तुति दर्शकों को वृंदावन की माखन-मिश्रित बाल लीलाओं से लेकर द्वारका के मौन और विराट अंतिम क्षणों तक ले जाती है। कुल 20 जीवंत दृश्यों में रचा गया यह नाटक श्रीकृष्ण के जीवन के उन पहलुओं को भी उजागर करता है, जिन पर कम बात हुई है, जहाँ ईश्वर केवल पूज्य नहीं, बल्कि संवेदनशील, प्रश्नकर्ता और मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित हैं।

श्रीकृष्ण की भूमिका में सौरभ राज जैन अपनी दिव्य शांति और करुणा से मंच को आलोकित करते हैं, वहीं पूजा बी शर्मा राधा और महामाया के रूप में प्रेम और माया, दोनों की गहराई को स्पर्श करती हैं। अर्पित रांका दुर्योधन और कंस जैसे जटिल नकारात्मक पात्रों को निभाकर कथा को संघर्ष और प्रश्नों की धार देते हैं। नाटक का निर्देशन राजीव सिंह दिनकर ने किया है, जिनकी परिकल्पना रंगमंच को केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि अनुभव करने की प्रक्रिया बना देती है। निर्माण की कमान विवेक गुप्ता, राजीव सिंह दिनकर और विष्णु पाटिल ने संभाली है। लेखन डॉ. नरेश कात्यायन का है और मौलिक संगीत उद्भव ओझा की रचना है, जो भावनाओं को सुरों में ढाल देता है।

नाट्यकला, संगीत, नृत्य और मल्टीमीडिया का यह संतुलित संयोजन इसे एक इमर्सिव थिएटर अनुभव बनाता है  जहाँ प्रकाश, ध्वनि और स्थान भावनाओं में बदल जाते हैं। निर्देशक राजीव सिंह दिनकर का कहना है कि  मेरे लिए यह प्रस्तुति पूजा का मंचन नहीं है। यह जागरूकता का आमंत्रण है। मैं नहीं चाहता कि दर्शक यह पूछते हुए जाएँ कि ‘कृष्ण कौन हैं?’  मैं चाहता हूँ कि वे यह महसूस करें कि कृष्ण को शब्दों में बाँधना मुश्किल है। इसलिए हमने स्थान, प्रकाश और ध्वनि को भाषा बनाया। हर दृश्य एक चलती हुई पेंटिंग है जहाँ रंगमंच, दर्शन और आत्म-अन्वेषण एक-दूसरे में घुलते हैं। श्री कृष्ण का किरदार निभा रहे

सौरभ राज जैन कहते हैं कि यह किरदार निभाना नहीं, जीना है। यहाँ कृष्ण भगवान से पहले एक मार्गदर्शक, मित्र और दार्शनिक हैं। इस नाटक ने मुझे भी भीतर से बदल दिया है। पूजा बी शर्मा (राधा/महामाया) कहती हैं “राधा प्रेम हैं और महामाया चेतना। दोनों को निभाते हुए मैंने स्त्री ऊर्जा के दो अत्यंत शक्तिशाली रूपों को महसूस किया।

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