मुख्यधारा की शिक्षा को गुरुकुल में जोड़ने की वकालत: भागवत बोले- नई शिक्षा नीति जरूरी, पुरानी गुलाम बनाने वाली

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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

नई दिल्ली 29 अगस्त 2025। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष में आयोजित तीन दिवसीय संवाद के अंतिम दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सवाल-जवाब सत्र को संबोधित किया। विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख ने नई शिक्षा नीति की तारीफ करते हुए कहा, नई शिक्षा प्रणाली इसलिए शुरू की गई, क्योंकि हमें केवल राज्य नहीं चलाना है, हमें लोगों को चलाना है। पुरानी शिक्षा प्रणाली विदेशी आक्रमणकारियों ने बनाई थी। हम हमेशा विदेशी आक्रमणकारियों के गुलाम रहे, जो उस समय के राजा थे। वे इस देश पर शासन करना चाहते थे, इसका विकास नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सभी प्रणालियां इस बात को ध्यान में रखते हुए बनाईं कि हम लोगों को गुलाम बनाए रखते हुए कैसे इस देश पर शासन कर सकते हैं…लेकिन अब हम स्वतंत्र हैं। इसलिए नई शिक्षा प्रणाली इसलिए शुरू की गई।

संघ प्रमुख ने मुख्यधारा की शिक्षा को गुरुकुल शिक्षा से जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि गुरुकुल शिक्षा का मतलब आश्रम में रहना नहीं, बल्कि देश की परंपराओं को सीखना है। भागवत ने कहा, गुरुकुल शिक्षा का मॉडल फिनलैंड के शिक्षा मॉडल जैसा है। फिनलैंड में शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए अलग विश्वविद्यालय है। स्थानीय आबादी कम होने के कारण कई लोग विदेशों से आते हैं, इसलिए वे सभी देशों के छात्रों को स्वीकार करते हैं। वहां, आठवीं कक्षा तक की शिक्षा छात्रों की मातृभाषा में दी जाती है। इस दौरान कोई क्लास वर्क नहीं दिया जाता। दस छात्रोंं पर एक शिक्षक का औसत है।

हर भाषा राष्ट्रभाषा

  • संघ प्रमुख ने कहा, विदेशी नहीं, देश में इस्तेमाल होने वाली हर भाषा राष्ट्रभाषा है। सभी मातृभाषा के पास अपनी संस्कृति, अपनी विरासत है। सवाल संपर्क की भाषा पर सहमति बनाने की है। यह विदेशी नहीं होनी चाहिए। हमें मिलजुलकर तय करना होगा कि देश की संपर्क भाषा क्या होगी।
  • इस दौरान उन्होंने संस्कृत की शिक्षा की वकालत करते हुए कहा कि चूंकि सारे ग्रंथ, उपनिषद इसी भाषा में लिखे गए, इसलिए संस्कृत के ज्ञान के बिना हम अपने देश को नहीं जान सकते। उन्होंने कहा कि अनुवाद ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ स्रोत नहीं है। गलत अनुवाद के कारण ही देश में कई भ्रांतियां पैदा हुई हैं।


अंग्रेजी उपन्यास पढ़ें पर प्रेमचंद को न छोड़ें
भागवत ने कहा कि आप अंग्रेजी उपन्यास पढ़ें। हम अंग्रेज नहीं हैं, हमें अंग्रेज नहीं बनना है, लेकिन अंग्रेजी भाषा सीखने में क्या दिक्कत है? मुझे भी पिताजी ने कई अंग्रेजी उपन्यास पढ़ाए। इससे मेरे हिंदुत्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन अंग्रेजी लेखकों को पढ़ें और प्रेमचंद जैसे भारतीय कहानीकारों को छोड़ दें, यह ठीक नहीं है।

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