सुप्रीम कोर्ट ने तय किया समय

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
नई दिल्ली, 02 नवंबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में 7 और 8 नवंबर, 2026 को ग्रीन पटाखे फोड़ने की अनुमति दी है। पटाखे सुबह 6 बजे से 7 बजे तक और रात 8 बजे से 10 बजे तक फोड़े जा सकेंगे। यह अनुमति सुप्रीम कोर्ट के 15 अक्तूबर, 2025 के पहले के आदेश के अनुसार दी गई है।
कहां नहीं फोड़ सकेंगे पटाखे?
शीर्ष कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राथमिक और जिला स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों और अधिसूचित शांत क्षेत्रों के 300 मीटर के दायरे में कोई भी पटाखा नहीं फोड़ा जाएगा।
कौन से इलाके होंगे नो-क्रैकर जोन?
कोर्ट ने कहा है कि इन सभी क्षेत्रों के साथ शैक्षणिक संस्थानों को भी ‘नो-क्रैकर जोन’ घोषित किया जाएगा। इन क्षेत्रों को उचित तरीके से चिह्नित किया जाएगा और इनके बारे में लोगों को जानकारी दी जाएगी।
बेरियम वाले पटाखों पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वैध प्रमाणपत्र रखने वाले पटाखा और आतिशबाजी निर्माता केवल ग्रीन पटाखों का ही निर्माण कर सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि बेरियम वाले पटाखों और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनईईआरआई) से ग्रीन पटाखों के रूप में मंजूरी नहीं पाने वाले पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होगी।
कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के अधिकारियों से अवैध और पारंपरिक पटाखों की आपूर्ति रोकने के लिए कदम उठाने को कहा है।
पटाखों के धुएं का शरीर पर क्या असर पड़ता है?
पटाखों से होने वाले नुकसान को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि उन्हें जलाने पर क्या होता है। पटाखे जलाने से हवा में बड़ी मात्रा में कणीय पदार्थ (पीएम) निकलते हैं। इनमें पीएम 10 और पीएम 2.5 शामिल हैं।
ये हवा में मौजूद ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण होते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि नाक और फेफड़ों में आसानी से पहुंच जाते हैं। फेफड़ों से ये खून में मिल जाते हैं। इसके बाद शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच जाते हैं। यहां तक कि ये इंसानी दिमाग में भी पाए जाते हैं। ये शरीर की सभी झिल्लियों को पार कर सकते हैं।
कणीय पदार्थों में पीएम 2.5 सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति जमीन पर खड़ा होकर पीएम 2.5 का एक कण अपनी कमर की ऊंचाई से गिराए, तो उसे जमीन तक पहुंचने में एक महीने का समय लगेगा। ये कण हवा में लगातार बने रहते हैं। इसलिए आतिशबाजी भले ही दो या तीन दिन हो या कुछ घंटों तक चले, लेकिन इसके कण हवा में तीन महीने तक रह सकते हैं।
हवा में मौजूद छोटे कणों में पीएम 2.5 सबसे ज्यादा नुकसानदायक होते हैं। पटाखों में बेरियम लवण का भी इस्तेमाल होता है। इससे आतिशबाजी में चमकीली हरी लौ निकलती है। यह पाउडर को तेजी से जलने के लिए ऑक्सीजन भी देता है। लेकिन बेरियम जलने से जहरीले कण हवा में फैलते हैं। इससे फेफड़ों और दिल को नुकसान पहुंचता है। बेरियम वाले पटाखों को निगलने से खून में पोटैशियम का स्तर तेजी से गिर सकता है। इस स्थिति को हाइपोकैलेमिया कहते हैं। इससे मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। दिल की धड़कन की लय बिगड़ सकती है और सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
पटाखों में रंग और आवाज पैदा करने के लिए कई तरह के रसायनों और धातुओं का इस्तेमाल होता है। इनके जलने से जहरीली गैसों के अवशेष भी निकलते हैं। पटाखों और वायु प्रदूषण के बीच संबंध दिवाली के बाद साफ दिखाई देता है। दिवाली के बाद दिल्ली-एनसीआर की हवा की गुणवत्ता तेजी से गिरती है। अस्पतालों में सांस से जुड़ी बीमारियों और गर्भावस्था संबंधी परेशानियों के मामले बढ़ जाते हैं।
इसी वजह से कोर्ट ने केवल ग्रीन पटाखों की अनुमति दी है। इनमें ऐसे उत्पाद शामिल हैं, जिनमें बेरियम, लिथियम, आर्सेनिक, एंटीमनी, सीसा और पारा नहीं होता।

