
छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
नागपुर 14 अप्रैल 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि जब-जब दुनिया संकटों में घिरती है, तब भारत ही उसे रास्ता दिखाता है। उन्होंने देश की इस क्षमता का श्रेय उसकी गहरी आध्यात्मिक परंपरा और संतों के मार्गदर्शन को दिया। नागपुर में आयोजित ‘श्री मज्जिनेंद्र पंचकल्याणेश्वर प्रतिष्ठा महोत्सव’ के दौरान भागवत ने कहा, भौतिकवाद और उपभोक्तावाद की आंधियों ने दुनिया की कई सभ्यताओं को कमजोर कर दिया, लेकिन भारत अपनी मूल पहचान के साथ मजबूती से खड़ा रहा। उनके अनुसार, यह स्थिरता भारत की आध्यात्मिक चेतना का परिणाम है। उन्होंने प्राचीन सभ्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रीस, मिस्र और रोम जैसी सभ्यताएं इतिहास में विलीन हो गईं, जबकि भारत आज भी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ मौजूद है। इसका कारण संतों और ऋषियों द्वारा दी गई ज्ञान परंपरा है, जो समाज को निरंतर दिशा देती रही है।
भागवत ने समाज में संतों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि उनके विचारों को जीवन में अपनाने से सकारात्मक परिवर्तन संभव है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे इस आध्यात्मिक धरोहर को समझें और अपने आचरण में उतारें। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक भारत अपनी मूल भावना के साथ कायम रहेगा, तब तक विश्व में संतुलन और शांति बनी रहेगी।
समाज को आकार देने में संतों ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भागवत ने कहा, समाज को आकार देने में संतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदू समाज, हमारे राष्ट्र का समाज, धीरे-धीरे खुद को ढालने और रूपांतरित करने की अनूठी क्षमता रखता है। यह इसलिए है क्योंकि हमारे देश के संत, ऋषि और तपस्वी निरंतर हमारे समाज को आकार दे रहे हैं और तैयार कर रहे हैं। बाहरी दुनिया भौतिकवाद, संकीर्णतावाद और उपभोक्तावाद के तूफान से घिरी हुई है, ये वे शक्तियां हैं जिन्होंने अन्य समाजों के विघटन का कारण बनी हैं। फिर भी, हमारे लिए, वह लहर बस हम पर से गुजर जाती है। हम अपने मूल स्वरूप में अडिग और अपरिवर्तित रहते हैं। यह लचीलापन आध्यात्मिक ज्ञान का फल है। यह हमारे संतों द्वारा हम पर प्रदत्त कृपा है।


