
छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
नई दिल्ली 01 जुलाई 2025। केंद्र सरकार जल्द ही राष्ट्रीय सहकारिता नीति की घोषणा करेगी, जो 2025 से 2045 तक यानी आजादी के शताब्दी वर्ष के कुछ समय पहले तक अमल में रहेगी। इसी राष्ट्रीय सहकारिता नीति के आधार पर सभी राज्य अपनी जरूरतों के अनुरूप सहकारिता नीति तैयार कर लक्ष्य भी तय कर सकेंगे। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह सोमवार को देशभर के सहकारिता मंत्रियों के साथ बैठक के दौरान कही। उन्होंने कहा कि सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करके ही भारत आजादी के शताब्दी वर्ष तक एक आदर्श सहकारी राष्ट्र बन सकेगा। सहकारिता क्षेत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए आयोजित मंथन बैठक का उद्देश्य मौजूदा योजनाओं की समीक्षा, उपलब्धियों का आंकलन और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक गतिशील मंच प्रदान करना है। सहकारिता मंत्रालय की तरफ से आयोजित इस बैठक में शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में पुराने सहकारिता के संस्कार को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ नए परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर ही सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की थी। शाह ने कहा कि मोदी सरकार का लक्ष्य है कि अगले पांच साल में देश में एक भी गांव ऐसा न रहे, जहां एक कोई कोऑपरेटिव न हो और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहकारी डाटाबेस का उपयोग किया जाना चाहिए। शाह ने कहा कि देश में मोदी सरकार आने के बाद ही सामाजिक परिवर्तन का एक नया परिदृश्य सामने आया। पहले भारत में लगभग 60-70 करोड़ लोग ऐसे थे, जिनके पास कई पीढ़ियों तक जीवन जीने की मूलभूत सुविधाएं भी नहीं थीं। 2014 से 2024 तक के कालखंड में ही मोदी सरकार ने करोड़ों लोगों का सपना पूरा कर दिया और इन्हें घर, शौचालय, पीने का पानी, अनाज, स्वास्थ्य, गैस सिलिंडर आदि सुविधाएं मिलने लगीं।
सहकारिता से बदल सकता है जीवन
शाह ने कहा कि करोड़ों लोग अब अपने जीवन को और बेहतर बनाने के लिए उद्यम करना चाहते हैं, लेकिन इनके पास पूंजी नहीं है। इन करोड़ों लोगों की छोटी-छोटी पूंजी से बड़ा काम करने का एकमात्र रास्ता सहकारिता है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे 140 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए दो चीजें बेहद जरूरी हैं-एक, जीडीपी और जीएसडीपी का विकास और 140 करोड़ लोगों के लिए रोजगार का सृजन। देश के हर व्यक्ति को काम मुहैया कराने के लिए सहकारिता के सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं है।
ग्रामीणों के प्रति संवेदनशीलता जरूरी
शाह ने कहा, संवेदनशीलता के साथ देश के करोड़ों छोटे किसानों और ग्रामीणों के कल्याण के लिए सहकारिता को पुनर्जीवित करना ही होगा। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। इसे सफल बनाने के लिए भारत सरकार ने 60 पहल की हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण पहल है राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस का निर्माण, जिसकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि कमी कहां रह गई है। राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस इसीलिए बनाया गया कि राष्ट्रीय, राज्य, जिला और तहसील स्तर की सहकारी संस्थाएं मिलकर ये देख सकें कि किस राज्य के किस गांव में एक भी सहकारी संस्था नहीं है।
त्रिभुवन यूनिवर्सिटी की भूमिका व्यापक बनाएंगे
शाह ने कहा कि भारत में सहकारिता आंदोलन छिन्न-भिन्न होने की तीन वजहें रही हैं। एक तो समय के साथ कानून नहीं बदले गए, सहकारिता गतिविधियों में समय के साथ बदलाव नहीं किए गए और फिर इस क्षेत्र में सारी भर्तियां भाई-भतीजावाद से होती थीं। मोदी सरकार ने इस दिशा में बदलाव किए और त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी स्थापित की गई। शाह ने सभी राज्यों से कहा कि कम से कम एक सहकारिता प्रशिक्षण संस्था को त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी के साथ जोड़ें। इसके जरिये राज्य के कोऑपरेटिव आंदोलन की ट्रेनिंग की समग्र व्यवस्था त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी के माध्यम से की जाए।
नवगठित बहु-राज्य सहकारी समितियों के कामकाज की समीक्षा
बैठक के दौरान तीन नवगठित राष्ट्रीय बहु-राज्य सहकारी समितियों-राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लि., राष्ट्रीय सहकारी जैविक लि. और भारतीय बीज सहकारी समिति लि. के कामकाज में राज्यों की भूमिका की समीक्षा की गई। साथ ही एक टिकाऊ और सर्कुलर डेयरी अर्थव्यवस्था बनाने के उद्देश्य से श्वेत क्रांति 2.0 पहल पर विचार विमर्श किया गया।


