
छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
रांची 09 जून 2026। रांची के कोकर स्थित समाधि स्थल पर धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर राज्यपाल संतोष गंगवार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, विधायक कल्पना सोरेन सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और श्रद्धालुओं ने पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर उनके संघर्ष, त्याग और आदिवासी समाज के उत्थान में दिए गए योगदान को याद किया गया।
कौन थे बिरसा मुंडा?
बिरसा मुंडा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान जननायकों में शामिल हैं, जिन्होंने आदिवासी समाज के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी। उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को तत्कालीन बिहार (वर्तमान झारखंड) के उलिहातू गांव में एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने आदिवासी समुदाय पर हो रहे शोषण, अन्याय और अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों को करीब से देखा। उस दौर में आदिवासियों को उनकी जमीनों और जंगलों से बेदखल किया जा रहा था। इसके विरोध में बिरसा मुंडा ने लोगों को संगठित किया और अधिकारों की लड़ाई का बिगुल फूंका।
जल, जंगल और जमीन की लड़ाई
बिरसा मुंडा का मानना था कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का प्राकृतिक अधिकार है। उन्होंने इन संसाधनों की रक्षा को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा माना। इसी सोच के साथ उन्होंने आदिवासी समाज को जागरूक किया और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संदेश दिया।
अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह
19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ व्यापक आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्वाभिमान की लड़ाई भी था। उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासी एकजुट हुए और अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया।
आज भी प्रेरणा के स्रोत
बिरसा मुंडा का जीवन साहस, संघर्ष और सामाजिक न्याय की मिसाल माना जाता है। आदिवासी अधिकारों, सामाजिक समानता और स्वाभिमान के लिए उनका योगदान आज भी देशभर के लोगों को प्रेरित करता है। इसी कारण उन्हें आदरपूर्वक ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता कहा जाता है।


