21 नवंबर 2025 की अपनी प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से मजदूर-विरोधी श्रम संहिताओं को निरस्त करने की माँग दोहराई

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29 नवंबर 2025। सेन्टर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) ने 21 नवंबर 2025 को पीआईबी के माध्यम से चार श्रम संहिताओं पर जारी किए गए प्रेस विज्ञप्ति (पीआरआईडी 2192463) के भ्रामक दावों को जोरदार तरीके से खारिज किया है। भारत सरकार का प्रेस नोट इन संहिताओं को ‘‘मजदूर समर्थक’’ और ‘‘आधुनिकीकरण’’ के रूप में चित्रित करने का प्रयास करता है, जबकि वास्तव में वे आजादी के बाद से मजदूरों के कड़े संघर्षों से हासिल अधिकारों और हकों का सबसे व्यापक और आक्रामक हनन हैं, जिसका मकसद काॅरपोरेट के शोषण, ठेकेदारी और अनियंत्रित नियुक्ति और बर्खास्तगी को सुविधाजनक बनाना है। सीटू द्वारा सरकार के प्रचारित झूठे दावों पर अपना बिन्दुवार जवाब निम्न प्रकार से दिया गया। यह जानकारी छत्तीसगढ़ रिपोर्टर को छत्तीसगढ़ सीटू के जनरल सेक्रेटरी वी.एम. मनोहर ने दी।
”29 श्रम कानूनों को 4 संहिताओं में सरलीकृत करने के दावे“ पर!
तथाकथित सरलीकरण का इस्तेमाल मौजूदा श्रम कानूनों, जैसे औद्योगिक विवाद अधिनियम, कारखाना अधिनियम, और खदान अधिनियम, ठेका श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम, आदि के सुरक्षात्मक प्रावधानों को कमजोर, समाप्त और ध्वस्त करने के लिए किया गया है। अधिकारों को मजबूत करने के बजाय, ये संहिताऐं रोजगार की सुरक्षा को ख़त्म करती हैं, श्रम विभागों की भूमिका को कमजोर करती हैं, उसे नकारात्मक दिशा में धकेलती हैं, और पूरे कार्यबल को अनिश्चित रोजगार में धकेलती हैं। 90 फीसद से ज्यादा कार्यबल असंगठित क्षेत्र में है, तो नियुक्ति पत्र जारी करने की गारंटी कौन देगा?
‘‘गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों सहित सभी के लिए सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा’’ पर!
सामाजिक सुरक्षा संहिता किसी भी मायने में सार्वभौमिक कवरेज की गारंटी नहीं देती है। धारा 109-114 में बिना अनिवार्य समयसीमा, परिभाषित लाभ या आवंटन के ही केवल गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों के लिए योजनाओं की बात की गई है। टर्नओवर का 1-2 फीसद प्रस्तावित एग्रीगेटर योगदान पेंशन, पीएफ या स्वास्थ्य लाभ के लिए नाकाफी है; आधार-आधारित पोर्टेबिलिटी आदि सभी निरर्थक हैं जब तक कि रोजगार सम्बन्ध और नियोक्ता का दायित्व वैधानिक प्रावधानों और रोजगार रिकॉर्ड और उचित प्रवर्तन मशीनरी के माध्यम से सुनिश्चित नहीं किया जाता है – जो सभी संहिता में अनुपस्थित हैं। सामाजिक सुरक्षा संहिता ने कवरेज के लिए ईपीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी प्रावधानों में कर्मचारियों की सीमा संख्या को क्रमशः 20 और 10 की मौजूदा सीमा से और ईपीएफ और ईएसआई में वेतन सीमा को कम नहीं किया है। लेकिन पीआईबी के बयान में यह भ्रामक दावा किया गया है।
‘‘सभी के लिए न्यूनतम वेतन कवरेज और राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’’ पर!
वेतन संहिता, 15वें अंतर्राष्ट्रीय श्रम आयोग के मानदंडों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, वैज्ञानिक जीवनयापन वेतन प्रदान नहीं करती है। राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन, जो विभिन्न क्षेत्रों में बहुत भिन्न है, कई राज्यों को मौजूदा न्यूनतम वेतन कम करने के लिए बाध्य करेगा। इसके अलावा, इसे ‘‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’’ कहना एक घटिया और भ्रामक रणनीति है क्योंकि वेतन संहिता में कहा गया है कि यह क्षेत्र-दर-क्षेत्र अलग-अलग होता है। कमजोर निरीक्षण और प्रवर्तन प्रणालियों के कारण, पहले से ही न्यूनतम वेतन (पीएलएफएस 2023) से कम वेतन पाने वाले 45 फीसद से अधिक मजदूर किसी भी सार्थक सुरक्षा से बाहर रहेंगे। इसके अलावा, योजना मजदूरों जैसे कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा अभी भी इस न्यूनतम वेतन के दायरे से बाहर है।
निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर
सभी कर्मचारियों को ईएसआईसी सुविधाऐं प्रदान करने और मजदूरों की किसी भी सीमा और वेतन सीमा के बिना, नियोक्ताओं द्वारा ईएसआईसी में योगदान के साथ स्वास्थ्य सेवाऐं सुनिश्चित करने के बजाय, यह संहिता नियोक्ताओं के खर्च पर 40 वर्षों के बाद केवल वैधानिक स्वास्थ्य जाँच की बात करती है। यह कर्मचारियों और मजदूरों के साथ एक और धोखा है। 10 से कम संख्या के प्रतिष्ठानों के लिए, यह नियोक्ताओं के लिए वैकल्पिक और स्वैच्छिक है, जो अधिकांश नियोक्ता नहीं करते हैं, और जैसा कि वर्तमान में देखा जा रहा है, अनिवार्य होने पर भी इसका उल्लंघन बड़े पैमाने पर हो रहा है।
”समान लाभ सुनिष्चित करने वाले निष्चित अवधि के रोजगार“ पर!
निश्चित अवधि का रोजगार, स्थायी और मुख्य नौकरियों में अस्थायीपन को वैध बनाता है। नियोक्ताओं/कम्पनियों को स्थायी नौकरियों को अल्पकालिक अनुबंधों से बदलने की अप्रतिबंधित ताकत प्रदान की जाती है। एक वर्ष के बाद मिलने वाली ग्रेच्युटी सेवा की निरंतरता, वरिष्ठता और वास्तविक लाभों के नुकसान की भरपाई नहीं करती है। इस प्रावधान का मकसद स्थिर रोजगार को नष्ट करना और यूनियनीकरण को कमजोर करना है।
”महिला मजदूरों के लिए समान अवसर और सुरक्षित स्थिति“ पर!
बिना किसी प्रवर्तनीय सुरक्षा उपाय और सहमति के रात्रि पाली की अनुमति देने से संकटग्रस्त श्रम बाजार में जबरदस्ती सहमति को बढ़ावा मिलता है। ये संहिताऐं महिला मजदूरों के सामने आने वाली वास्तविक समस्याओं, जैसे कि ठेका प्रथा, असमान वेतन, उत्पीड़न, असुरक्षित कार्यस्थल और मातृत्व लाभ से वंचितता, के समाधान के लिए कुछ नहीं करतीं। लैंगिक भेदभाव पर प्रतिबंध, कड़े प्रवर्तन के बिना निरर्थक हैं, जिन्हें संहिताऐं पूरी तरह से समाप्त कर देती हैं।
”एमएसएमई, बागान, खदान और निर्माण मजदूरों के लिए बेहतर सुरक्षा“ पर!
स्व-प्रमाणन और छूट तंत्र, और सबसे बढ़कर, कवरेज के लिए सीमा स्तर में वृद्धि, एमएसएमई में सुरक्षा और श्रम मानकों को कमजोर करती है, बल्कि उन्हें नकारती है, जिससे मजदूर पूरी तरह असुरक्षित हो जाते हैं।निर्माण मजदूर कल्याण निधि का अभी भी कम उपयोग हो रहा है (इसके अलावा नियोक्ताओं द्वारा उपकर भुगतान की बड़े पैमाने पर चोरी को बढ़ावा मिल रहा है – रु॰ 38,000 करोड़ से अधिक राशि खर्च नहीं की गई (सीएजी 2022); और संहिताऐं पारदर्शिता या गारंटीकृत भुगतान के लिए कोई तंत्र प्रदान नहीं करती हैं। खनन और वृक्षारोपण जैसे खतरनाक क्षेत्रों में निरीक्षणों में ढील देने से भारत में पहले से ही खतरनाक कार्यस्थल मृत्यु दर और भी बदतर हो जाएगी।
”मजबूत, तीव्र औद्योगिक विवाद समाधान“ पर!
औद्योगिक सम्बन्ध संहिता सभी क्षेत्रों के लिए विभिन्न शर्तें लागू करके, सुलह के दौरान और बाद में हड़तालों पर प्रतिबंध लगाकर और सभी प्रतिष्ठानों पर प्रतिबंध बढ़ाकर हड़ताल के अधिकार को कमजोर करती है। पूर्व सरकारी अनुमति के लिए छंटनी, कामबंदी और बंद करने की सीमा को 300 मजदूरों तक बढ़ाने से 90 फीसद से अधिक भारतीय कार्यस्थलों में काम पर रखने और निकालने की सुविधा मिलती है। 12 लाख से अधिक विवाद अब न्याय निर्णय के लिए लंबित हैं; 75 फीसद से अधिक विवादों के लिए विवाद-न्याय निर्णय की औसत निपटान अवधि 3 से पांच साल तक है। श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन से स्थिति और खराब हो जाएगी क्योंकि सरकार, अपनी श्रम शक्ति नीति के माध्यम से, जिसे पहले ही सार्वजनिक डोमेन में डाल दिया गया है, पहले ही ‘‘कानूनों के अनुपालन से खुद को रोजगार के सूत्रधार की भूमिका में बदलकर’’ श्रम कानूनों को लागू करने की अपनी अनिवार्य जिम्मेदारी के त्याग की पुष्टि कर चुकी है।
”निरीक्षक-एवं-सुविधाकर्ता द्वारा पारदर्षिता में सुधार“ पर!
स्वतंत्र निरीक्षकों की जगह सुविधा प्रदाताओं को लाना, एल्गोरिथम-आधारित निरीक्षणों को अपनाना और शिकायत-आधारित निरीक्षण को समाप्त करना, विनियमन-मुक्ति की दिशा में सीधे कदम हैं। केन्द्रीकृत औचक निरीक्षण और स्व-प्रमाणन के अनुपालन से वेतन, सुरक्षा मानदंडों, कार्य घंटों और सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के उल्लंघन को बढ़ावा मिलेगा। इससे मजदूर शोषण से लड़ने के लिए एक आवश्यक कानूनी तंत्र खो देंगे।
‘‘श्रम लचीलेपन से अधिक नौकरियां और निवेष पैदा होंगे’’ पर!
यह दावा पूरी तरह से कपटपूर्ण है। ऐसा कोई भी राष्ट्रीय या अंर्तराष्ट्रीय प्रमाण नहीं है कि श्रम अधिकारों को कमजोर करने से रोजगार पैदा होता है। राजस्थान के श्रम कानून में बदलाव (2014-15), जिनका अक्सर सरकार हवाला देती है, रोजगार बढ़ाने में विफल रहे और इसके बजाय ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया। आज भारत रिकॉर्ड स्तर पर बेरोजगारी और बढ़ती अनौपचारिकता का सामना कर रहा है, औपचारिक क्षेत्रों में भी रोजगार सम्बन्धों में अस्थिरता और रोजगार सृजन निवेश में लगातार ठहराव/गिरावट का सामना कर रहा है, जिसे आरबीआई सहित आधिकारिक रिपोर्टों द्वारा भी नकारा नहीं जा सकता। ये संहिताऐं सुरक्षित नौकरियों की जगह फेंकने योग्य ठेका मजदूरों, अप्रेन्टिशों/ट्रेनीज और प्रशिक्षुओं को लाकर संकट को कई गुना बढ़ा देंगी।
”व्यापक हितधारक परामर्ष“ पर!
देश का सर्वोच्च त्रिपक्षीय आधिकारिक मंच, भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी), ट्रेड यूनियनों के लगातार आग्रह के बावजूद, पिछले दस वर्षों से नहीं बुलाया गया है। सीटू, एटक, इंटक, एचएमएस, सेवा, एआईयूटीयूसी, एआईसीसीटीयू, यूटीयूसी, टीयूसीसी और अन्य सहित सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने हर परामर्श में ठोस और अकाट्य तर्कों और दस्तावेजी प्रमाणों के साथ इन संहिताओं का सर्वसम्मति से विरोध किया। सरकार ने ट्रेड यूनियनों द्वारा उठाई गई हर बड़ी आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया। विपक्ष की उपस्थिति के बिना ही इन संहिताओं को संसद में पारित कर दिया गया, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मखौल उड़ाया गया।
चारों श्रम संहिताऐं, काॅरपोरेट द्वारा संचालित श्रम बाजार विनियमन का एक साधन हैं, जिनका मकसद हैः नौकरी की सुरक्षा को नष्ट करना, हड़ताल के अधिकार का दमन, श्रम निरीक्षण को खत्म करना, ठेकेदारी और निश्चित अवधि के रोजगार का विस्तार करना, यूनियनों और सामूहिक सौदेबाजी को कमजोर करना और सामाजिक सुरक्षा को प्रतीकात्मक योजनाओं तक सीमित करना – इन सभी का मकसद श्रम लागत को न्यूनतम करने और श्रम अधिकारों को खत्म करने का एक पागल अभियान है।
सीटू की सभी चार श्रम संहिताओं को निरस्त करने की माँग
सीटू भारत के मजदूर वर्ग से आह्वान करता है कि वे केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के एकजुट आह्वान में शामिल हों और क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर जुझारू एकजुट संघर्ष के माध्यम से ऐसे क्रूर जनविरोधी कदमों का डटकर विरोध करें तथा सामूहिक रूप से उन अधिकारों पर जोर दें जिन्हें छीनने का प्रयास किया जा रहा है।
सीटू तत्काल स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन के लिए मजदूरों को सलाम करता है, और अपनी यूनियनों, विभिन्न क्षेत्रों, उद्योगों और क्षेत्रों के मजदूरों से एकजुट संघर्षों को तेज करने, व्यापक संयुक्त ट्रेड यूनियन कार्रवाइयों में शामिल होने और श्रम अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए शक्तिशाली प्रतिरोध का निर्माण करने का आग्रह किया था और 26 नवंबर 2025 को पूरी ताकत के साथ उठ खड़े हुए थे। भारत का मजदूर वर्ग पहले भी मजदूर विरोधी नीतियों से लड़कर उन्हें पराजित कर चुका है; वह फिर से ऐसा ही करेगा।


