राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव

Chhattisgarh Reporter
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आत्मा से संवाद का उत्सव है अरुणाचल का लोकनृत्य इगु, मृत्यु उपरांत उपवास कर संवाद किया जाता है मृतात्मा से

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर

रायपुर, 2 नवम्बर 2022। अरुणाचल की लोकसंस्कृति में मृत्यु के पश्चात आत्मा से संवाद लोकनृत्य के माध्यम से होता है। सामान्य मौत की स्थिति में परिजनों के मृत्यु के चार-पांच दिन तक उपवास रखा जाता है और इस अवधि में मृतात्मा से संवाद लोकनृत्य के माध्यम से होता है। यह संवाद इदुमिस्थि जनजाति द्वारा किया जाता है।  अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ यह संवाद किया जाता है। उल्लेखनीय है कि अनेक जनजातियों में मृतात्मा के साथ ऐसे संवाद की परंपरा रही है और बहुत समृद्ध परंपरा रही है। ऐतिहासिक रूप से भी मृत्यु संबंधी अनेक लोकमान्यताएं जनजातीय समुदाय में मिलती हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि इगु नृत्य का प्रदर्शन केवल सामान्य मौत में ही होता है। असामयिक रूप से किसी की मृत्यु हुई हो तो यह नृत्य नहीं होता। पारंपरिक अरुणाचल के परिधान के साथ और उनके खास वाद्ययंत्रों के साथ इगु का प्रदर्शन राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में हुआ। राजधानी में आयोजित इस महोत्सव में अरूणाचल के इस लोक नृत्य को लोगों ने खूब सराहा। 

मणिपुर के कलाकार “डान्स ऑफ़ लाइवलीहुड” का प्रदर्शन 

मणिपुर के कलाकार ने “डान्स ऑफ़ लाइवलीहुड” का प्रदर्शन किया। बिना वाद्य यंत्रों के प्रयोग से यह नृत्य किया जाता है। यह झूम खेती की तैयारी का नृत्य है। वर्ष में जब भी उत्सव मनाना हो इसे किया जाता है।

असम के बालमफा नृत्य की प्रस्तुति दी गई। बंसी की धुन पर आकर्षक वेशभूषा में महिला कलाकारों की प्रस्तुति

लाल पीले हरे परिधान, गले में मोती की माला और बालों को लाल रिबन से सहेजा गया है।

नरसिंह का मुखौटा लगा किया लोक नृत्य, महाराष्ट्र में मशहूर है सोंगी मुखौटा नृत्य

पौराणिक कथाओं में नरसिंह अवतार की कथा आती है जिसमें भगवान विष्णु नरसिंह का रूप लेकर हिरण्यकश्यप का वध करते हैं। यह कथा असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। इसी कथा को आधार बनाकर महाराष्ट्र में सोंगी मुखौटा लोकनृत्य किया जाता है। होली पर्व के बाद महाराष्ट्र में यह नृत्य किया जाता है और देवी की पूजा के साथ उत्सव मनाया जाता है। कथा में दो कलाकार नरसिंह का रूप धारण कर नृत्य करते हैं और ढोल पावरी तथा संबल वाद्य यंत्रों के माध्यम से पैदा हुई ध्वनि से कथा दर्शकों के समक्ष जीवंत हो जाती है।

इसके साथ ही नर्तक काल भैरव और बेताल के मुखौटे भी पहनते हैं जिससे लोक में प्रचलित बहुत सी कथाएं लोकनृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त हो जाती है। इसके साथ ही कलाकार पिरामिड का आकार भी लेते हैं। लोकनृत्य के साथ होली त्योहार का उत्सव महाराष्ट्र में पूरा होता है। सोंगी मुखौटा नृत्य के इस अद्भुत दृश्य को आज राष्ट्रीय आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव के माध्यम से दर्शकों ने देखा और इसका पूरा आनंद लिया।

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