हाईकोर्ट ने 10% पदोन्नति कोटे को असंवैधानिक ठहराया

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
ग्वालियर, 31 अक्टूबर 2026। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने राज्य के अभियोजन विभाग में लिपिकों को सीधे सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी बनाने वाले 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया है। उच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को चोर रास्ते से अधिकारी बनाने जैसा कदम बताया। अदालत के इस निर्णय के पश्चात अब इस श्रेणी के पदों पर केवल मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से ही सीधी भर्ती प्रक्रिया आयोजित होगी।
न्यायाधीश जीएस अहलूवालिया और न्यायाधीश अनुराधा शुक्ला की युगल पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिका प्रस्तुत होने की तिथि से पूर्व इस कोटे के अंतर्गत पदोन्नत हो चुके कर्मचारियों की सेवा पर इस निर्णय का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, भविष्य में इस कोटे के तहत कोई नई पदोन्नति नहीं दी जा सकेगी।
अनुभव और परीक्षा बिना जिम्मेदारी अनुचित
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पाया कि अखिल भारतीय बार परीक्षा उत्तीर्ण किए बिना तथा वकालत का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किए बिना कर्मचारियों को सीधे न्यायालय में मुकदमों की पैरवी की जिम्मेदारी देना न्यायसंगत नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की कि केवल विधि की स्नातक उपाधि प्राप्त कर लेने मात्र से कोई कर्मचारी अधिवक्ता नहीं बन जाता। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि लिपिकीय वर्ग का मूल कार्य कार्यालयीन अभिलेख, फाइलें तथा प्रशासनिक दस्तावेज संभालना है। दूसरी ओर, सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी का कार्य न्यायालय परिसर में राज्य सरकार का पक्ष मजबूती से रखना होता है। ऐसे अधिकारियों को आपराधिक मामलों में साक्षियों से परीक्षण, साक्ष्य प्रस्तुत करने और विधिक तर्क रखने की गंभीर जिम्मेदारी निभानी होती है।
दोहरे रास्तों और समानता के नियम का उल्लंघन
उच्च न्यायालय ने 1998 के सेवा नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि सहायक ग्रेड-3 के कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए पहले से ही एक निश्चित क्रम निर्धारित है। इसके अंतर्गत सहायक ग्रेड-2, सहायक ग्रेड-1 और अधीक्षक के पद शामिल हैं। ये सभी पद तृतीय श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। अदालत ने कहा कि एक ही मूल पद से तृतीय श्रेणी और सीधे द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित पद पर पदोन्नति के दो अलग-अलग रास्ते होना वैधानिक रूप से अनुचित है। अदालत के अनुसार, लिपिकों को सीधे राजपत्रित पद पर पदोन्नत करने का यह विशेष प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 के अंतर्गत प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
विभागीय सिफारिश और दो दशकों पुराना विवाद
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार राज्य सरकार ने 14 अक्तूबर 2002 को लोक अभियोजन भर्ती नियमों में संशोधन किया था। इस संशोधन के माध्यम से लोक सेवा आयोग द्वारा भरी जाने वाली सीधी भर्ती के कुल पदों में से 10 प्रतिशत पद उन लिपिकों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे, जिनके पास सात वर्ष की सेवा अवधि और विधि की स्नातक उपाधि उपलब्ध थी। इस संशोधन की वैधता को अधिवक्ता रोहन शर्मा तथा अन्य अधिवक्ताओं ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि अभियोजन संचालक ने 4 जुलाई, 2019 को ही राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस कोटे को समाप्त करने की अनुशंसा की थी। विभागाध्यक्ष ने अपने पत्र में उल्लेख किया था कि पदोन्नति पाकर बने अधिकारी न्यायालयीन कार्य और मुकदमों की पैरवी में प्रभावी सिद्ध नहीं हो रहे हैं।


