नवंबर तक जुड़ जाएगा मस्तक

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
खजुराहो, 31 अक्टूबर 2026। खजुराहो स्थित ग्यारहवीं सदी के जवारी वामन मंदिर की खंडित प्रतिमा को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नवंबर तक पुराना रूप प्रदान करेगा। मंदिर के गर्भगृह में स्थित बलुआ पत्थर से निर्मित भगवान विष्णु की सात फीट ऊंची प्रतिमा का धड़, चारों भुजाएं और पैर मौजूद हैं, जबकि मस्तक लंबे समय से लापता था।
पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक यदुबीर सिंह रावत ने बताया कि प्रतिमा का मस्तक खजुराहो में ही विभाग के स्टोर रूम में रखा हुआ था। ब्रिक्स सम्मेलन में चर्चा के दौरान इस बात का खुलासा हुआ, जिसके बाद प्रतिमा के चित्रों, पत्थर की बनावट, रंग, अनुपात और मुकुट की विशिष्ट शैली के आधार पर मस्तक की पहचान की पुष्टि हुई।
हमला या तस्करी…कारण साफ नहीं
विशेषज्ञों की जांच और तकनीकी आकलन के बाद नवंबर तक मस्तक को प्रतिमा से जोड़ने का लक्ष्य तय किया गया है। हालांकि मस्तक प्रतिमा से कब और किन हालात में अलग हुआ, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। कुछ दावे इसे मुस्लिम शासकों के हमलों से जोड़ते हैं, जबकि कुछ लोग इसे मूर्ति तस्करी का मामला बताते हैं।
संरक्षण की मांग और सुप्रीम कोर्ट में याचिका
भगवान विष्णु की प्रतिमा के संरक्षण और मस्तक की पुनः स्थापना का मामला अदालतों तक पहुंच चुका है। मूर्ति संरक्षण फाउंडेशन के अध्यक्ष और पेशे से वकील राकेश दलाल ने 13 जून, 2025 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने गर्भगृह में स्थापित खंडित प्रतिमा को सम्मानपूर्वक संरक्षित करने, उसकी मरम्मत कराने या उसका मूल स्वरूप बहाल करने की मांग की थी। इस मांग को लेकर संस्था ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया, केंद्रीय गृह मंत्री को ज्ञापन सौंपा और खजुराहो में जागरूकता अभियान भी चलाया।
सीजेआई की टिप्पणी एवं स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट में तत्कालीन चीफ जस्टिस (सीजेआई) बीआर गवई की पीठ ने 16 सितंबर, 2025 को इस याचिका को खारिज कर दिया था। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की टिप्पणी पर विवाद खड़ा हो गया था, जिसमें उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा था कि अब जाकर भगवान से ही प्रार्थना करें, अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। बाद में 18 सितंबर, 2025 को चीफ जस्टिस ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उनकी बात को सोशल मीडिया पर गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया था और वे सभी धर्मों का पूरा सम्मान करते हैं।
यह अप्रिय घटना भी इसी मामले से जुड़ी
इस फैसले से नाराज अधिवक्ता राकेश कुमार ने 6 अक्तूबर को अदालत में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस बीआर गवई की ओर जूता फेंक दिया था। जूता पीठ तक नहीं पहुंचा और सुरक्षाकर्मियों ने अधिवक्ता को तुरंत पकड़ लिया। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने वर्ष 2011 से पंजीकृत वकील राकेश कुमार का वकालत का लाइसेंस रद्द कर दिया। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता को निलंबित करते हुए किसी भी अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगा दी। घटना के तुरंत बाद चीफ जस्टिस ने वकीलों को अपनी दलीलें जारी रखने का निर्देश दिया था।


