रक्षाबंधन पर देश में लगभग 25 हजार करोड़ रुपये का हो सकता है व्यापार

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छत्तीसगढ़ रिपोर्टर          

मुंबई, 21 अगस्त 2026। रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों के प्रति बढ़ते विश्वास और राष्ट्रभावना का भी उत्सव बन गया है। देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों की अच्छी मांग देखी जा रही है और विभिन्न राज्यों में तैयार की गई विशिष्ट भारतीय राखियां उपभोक्ताओं का विशेष आकर्षण बनी हुई हैं।

कॉन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर ने कहा कि इस वर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर देशभर में लगभग 25 हज़ार करोड़ रुपये का व्यापार का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 45 प्रतिशत अधिक है जबकि उपहार, मिठाई, वस्त्र एवं अन्य त्योहारी उत्पादों को मिलाकर कुल व्यापार 30 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच सकता है।पिछले वर्ष राखी का व्यापार देश भर में लगभग 17 हज़ार रुपए का हुआ था वहीं वर्ष 2023 में यह व्यापार 12 हज़ार करोड़ रुपये का हुआ था। कैट के अनुसार देशभर के बाजारों में इस वर्ष भी चीनी राखियों की कोई मांग नहीं है। व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं ने पूरी तरह स्वदेशी राखियों को अपनाया है और बाजारों में केवल भारतीय निर्मित राखियां ही उपलब्ध हैं। कैट देश के विभिन्न शहरों में विशेष स्वदेशी मेले आयोजित करने जा रहा हैं, जहां महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित राखियों एवं अन्य उत्पादों की बिक्री की जाएगी।

महिला व्यापारियों को मिलेगा लाभ 

कैट का मानना है कि स्वदेशी उत्पादों के प्रति बढ़ते रुझान और “वोकल फॉर लोकल” अभियान के कारण भारतीय कारीगरों, महिला उद्यमियों, लघु उद्योगों और स्थानीय व्यापारियों को इस रक्षाबंधन पर बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा।

ग्राहकों की पसंद में बदलाव 

धारावी के राखी कारोबारी हरमुख लाल पटवा ने बताया कि बाजार में कोलकाता और दिल्ली से भी राखियां आई हैं। ग्राहकों की पसंद में भी बदलाव दिख रहा है। खासकर बच्चों के लिए लाइट वाली राखियों की मांग बनी हुई है। इनमें चीन से आने वाले आइटम की हिस्सेदारी भी है। पटवा पिछले करीब 25 दिनों से राखी की दुकान लगाए हुए हैं। राखी का सीजन खत्म होने के बाद वे इमिटेशन ज्वेलरी के कारोबार में लौट जाएंगे।

स्टॉक का सही आकलन सबसे बड़ी चुनौती

राखी उत्पादक गंगादीन पटवा के मुताबिक राखी का कारोबार सीमित समय के लिए होता है। इसलिए उत्पादन और स्टॉक का आकलन बहुत महत्वपूर्ण है। यदि मांग से ज्यादा राखियां तैयार हो जाएं तो उन्हें अगले साल तक संभालकर रखना मुश्किल होता है। इस दौरान डिजाइन और ट्रेंड बदल जाने से पुराना स्टॉक बिकना भी मुश्किल हो जाता है और बचा हुआ माल उस साल की कमाई को नुकसान में बदल सकता है। उन्होंने बताया कि चीन से भी बड़ी मात्रा में राखियां बाजार में आ रही हैं और लाइट वाली राखियां बच्चों में लोकप्रिय हो रही हैं। चार रुपये से लेकर बाजार में सौ रुपए तक की राखियों की मांग बनी हुयी है। राखी व्यापारी मंगल जैन ने कहा कि राखी बनाने की लागत लगातार बढ़ी है। कारीगरों की मजदूरी भी बढ़ी है। अक्सर तीन-चार साल के अंतराल पर उत्पादन मांग से अधिक हो जाता है और व्यापारियों के पास स्टॉक बच जाता है। अगले साल तक उस स्टॉक को संभालना मुश्किल होता है, क्योंकि तब तक डिजाइन और ट्रेंड बदल चुके होते हैं। इसलिए राखी के कारोबार में बाजार की मांग को समझकर स्टॉक रखना सबसे जरूरी है।

सोने-चांदी की हल्की राखियों का भी चलन

ज्वेलरी मेकर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय शाह ने बताया कि सोने-चांदी ने निवेश के तौर पर अच्छा रिटर्न दिया है। इसके चलते त्योहार पर कुछ ग्राहक सोने-चांदी की हल्की राखियां भी पसंद कर रहे हैं। इन राखियों के लिए पहले से ऑर्डर देकर निर्माण कराया जा रहा है। खास बात यह है कि हल्की राखियों को ग्राहक बाद में आभूषण की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं। कारोबारियों का कहना है कि रक्षाबंधन से पहले अंतिम दिनों में राखी की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन इस बार त्योहार महीने के अंत में होने के कारण ग्राहकों के बजट पर दबाव रह सकता है परन्तु भावनात्मक त्यौहार के लिए लोग बजट नहीं देखते इससे व्यापारियों को  अच्छी बिक्री की उम्मीद है।

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