दुनिया की पहली स्किन कैंसर वैक्सीन से कम होगा मौत का खतरा

छत्तीसगढ़ रिपोर्टर
नई दिल्ली, अक्टूबर 2026। कैंसर वैश्विक स्तर पर मौत के प्रमुख कारणों में से एक है। इससे हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनियाभर में हर साल कैंसर के कारण लगभग 10 मिलियन (एक करोड़) लोगों की मौत होती है, जो इसे वैश्विक स्तर पर मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बनाता है।
कैंसर का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में फेफड़े- मुंह, स्तन और सर्वाइकल कैंसर का ख्याल आता है। कैंसर को लेकर एक बड़ा डर ये भी रहता है कि इलाज के बाद भी कहीं ये बीमारी दोबारा न लौट आए? खासकर मेलेनोमा जैसे आक्रामक स्किन कैंसर में यह खतरा और भी गंभीर हो सकता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन के नतीजे पेश किए हैं, जो इस डर को कम करने की नई उम्मीद जगा रही है।
खास बात यह है कि यह वैक्सीन हर मरीज के कैंसर की आनुवंशिक पहचान के आधार पर तैयार की जाती है, ताकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें खत्म कर सके। क्लिनिकल ट्रायल में इसके काफी अच्छे नतीजे देखे गए हैं। आइए इस बारे में विस्तार से जान लेते हैं।
मेलेनोमा कैंसर के शिकार लोगों के लिए राहत
मेलेनोमा, स्किन कैंसर के सबसे खतरनाक प्रकारों में से एक है। इससे जूझ रहे मरीजों के लिए जल्द ही एक नई वैक्सीन उम्मीद की किरण बन सकती है। इस वैक्सीन को हर मरीज के कैंसर के हिसाब से अलग-अलग तैयार किया जाता है। बड़े स्तर पर किए गए क्लिनिकल ट्रायल में इसके उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। अध्ययन के मुताबिक, इस वैक्सीन को इम्यूनोथेरेपी के साथ देने पर कैंसर के दोबारा लौटने या शरीर के दूसरे अंगों तक फैलने का खतरा 50% तक कम देखा गया।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) के अनुसार, दुनियाभर में मेलेनोमा के लगभग 3.40 नए मामले सामने आते है और इस बीमारी से लगभग 60,000 लोगों की मौत जाती है। यह त्वचा के कैंसर का एक आक्रामक प्रकार है, जो तेजी से शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल सकता है।
जब कैंसर पास की लिम्फ नोड्स या फेफड़ों, लिवर और दिमाग जैसे दूर के अंगों तक फैल जाता है, तो इससे मरीजों के लिए स्थिति और गंभीर हो जाती है। ऐसे मामलों में केवल 40 प्रतिशत मरीज ही पांच साल तक जीवित रह पाते हैं। इस तरह के खतरे को कम करने के लिए विशेषज्ञों ने नई वैक्सीन के बारे में जानकारी दी है।
इंटिस्मेरान वैक्सीन के बारे में जानिए
इंटिस्मेरान नाम की इस वैक्सीन पर काम कर रहे शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके नतीजे कैंसर के इलाज के एक नए दौर की शुरुआत कर सकते हैं।
- ट्रायल में पाया गया कि इम्यूनोथेरेपी के साथ वैक्सीन देने से दो साल के दौरान मेलेनोमा के दोबारा लौटने या फैलने का खतरा केवल इम्यूनोथेरेपी लेने वाले मरीजों की तुलना में 38 प्रतिशत तक कम हुआ।
- यह पहली ऐसी पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन है, जिसने तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल में सकारात्मक नतीजे दिखाए हैं।
- यहां समझना जरूरी है कि तीसरे चरण का ट्रायल किसी इलाज की प्रभावशीलता और सुरक्षा को बड़ी संख्या में मरीजों पर परखने का महत्वपूर्ण चरण होता है।
कैंसर रिसर्च यूके की रिसर्च डायरेक्टर डॉ. कैथरीन इलियट ने इन नतीजों को उत्साहजनक बताया। वह कहती हैं, इससे सर्जरी के बाद मरीजों में दोबारा कैंसर होने की टेंशन को खत्म किया जा सकता है। हर व्यक्ति का कैंसर दूसरे लोगों से अलग हो सकता है। इसलिए मरीज की जरूरत के मुताबिक इलाज तैयार करने पर शोध करना बेहद जरूरी है।
कैसे किया गया वैक्सीन का ट्रायल?
इस अध्ययन के नतीजे यूरोपियन सोसाइटी फॉर मेडिकल ऑन्कोलॉजी के कैंसर सम्मेलन में पेश किए जाने हैं। इस ट्रायल में कुल 1,137 मरीज शामिल हुए। इन सभी का कैंसर सर्जरी के जरिए निकाल दिया गया था, लेकिन डॉक्टरों को आशंका थी कि भविष्य में बीमारी दोबारा लौट सकती है।
सभी मरीजों को एक साल तक पेम्ब्रोलिजुमैबनाम की इम्यूनोथेरेपी दवा दी गई। इम्यूनोथेरेपी ऐसा इलाज है, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने में मदद करता है। गौरतलब है कि मेलेनोमा के इलाज में इम्यूनोथेरेपी की महत्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि, यह हर मरीज पर समान रूप से असर नहीं करती।
कुछ मामलों में कैंसर कोशिकाएं इलाज के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेती हैं। वे दवा के असर से बचने लगती हैं और इलाज का प्रभाव कम हो सकता है। इसी वजह से शोधकर्ता इम्यूनोथेरेपी के साथ कैंसर वैक्सीन देने की संभावना तलाश रहे हैं।
- ट्रायल में लगभग दो-तिहाई मरीजों को इम्यूनोथेरेपी के साथ इंटिस्मेरान वैक्सीन भी दी गई। बाकी मरीजों को असली वैक्सीन के बजाय प्लेसिबो दिया गया।
- इस अध्ययन में पाया गया कि इलाज के दो साल बाद वैक्सीन लेने वाले मरीजों में कैंसर के दोबारा लौटने या दूसरे अंगों तक फैलने की आशंका 42 प्रतिशत कम थी।
- हालांकि, वैक्सीन के कुछ साइड इफेक्ट भी सामने आए। हर 100 मरीजों में लगभग छह मरीजों को इलाज से जुड़े दुष्प्रभाव हुए। इनमें बुखार, थकान और इंजेक्शन लगाने वाली जगह पर प्रतिक्रिया होना शामिल था।

